आध्यात्म का भाव होता है आत्मा का अध्ययन ।यह अध्ययन तब ही प्रारम्भ होगा जब हम ईश्वर की ज्योति का घट में दर्शन करेंगे क्योंकि हमारे शास्त्र कहते हैं ईश्वर मानने का नहीं बल्कि देखने जानने का विषय है - स्वामी दिनकरानंद जी

जालंधर:- दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान एवं भगवान वाल्मीकि जागृति सभा द्वारा भगवान वाल्मीकि जयंती पर  आबादपुरा जालंधर में कार्यक्रम आयोजित किया गया l इसमें काफी गिनती में भक्तों श्रद्धालुओं ने हाज़री लगाई। जिसमें श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी दिनकरानंद जी ने अपने विचारों में कहा  कि भारत वर्ष में महर्षि वाल्मीकि जी को संस्कृत के प्रथम महाकाव्य 'रामायण' की रचना करने के कारण ही उन्हें 'आदिकवि' कहा जाता है समाज में जब भी ऐसे महान महापुरुषों का आगमन धरती पर होता है तो वह भटके हुए मानव जाति को दिशा दिखाते हैं और शांति की स्थापना करते हैं l


भौतिकता की अंधी दौड़ में हर कोई आज भटक रहा है, जिस कारण वह हताश और परेशान है- स्वामी दिनकरानंद जी

 स्वामी जी ने बताया कि भौतिकता की अंधी दौड़ में हर कोई आज भटक रहा है, जिस कारण वह हताश और परेशान है व बीमारियों से ग्रस्त हो रहे है। स्वयं को बौद्धिक और विकसित श्रेणी में शुमार होने वाले देश की अमूल्य निधि आध्यात्म की ओर लौट रहे हैं।इसी में वे शान्ति पा रहे हैं।जिससे उनका बाकी जीवन अच्छा गुजर रहा है।इसीलिए हमारे महापुरुष कहते हैं कि शान्ति भौतिक धन संपदा में नहीं बल्कि आध्यात्म निधि में है और सुख व शांति कहीं बाहर नहीं बल्कि मानव के भीतर है। 
 

माता शबरी के पास कोई भौतिक सम्पदा  नहीं लेकिन जीवन आनन्दमयी था।इसीलिए स्वामी जी ने कहा आज हमें भी उस आध्यात्म से जुड़ना होगा अगर आत्मिक आनंद पाना चाहते  हैं।आध्यात्म का भाव होता है आत्मा का अध्ययन ।यह अध्ययन तब ही प्रारम्भ होगा जब हम ईश्वर के ज्योति का घट में दर्शन करेंगे क्योंकि हमारे शास्त्र कहते हैं ईश्वर मानने का नहीं बल्कि देखने जानने का विषय है।जब जानेगा तब ध्यान लगेगा और मानव भीतर से शांत होगा ।अंत में अन्य स्वामी भाइयों  द्वारा सुमधुर भजनों का गायन किया गया l इस कार्यक्रम में चंद्र कल्याण, रामप्रकाश चुंबर, कमल कुमार ,हरीश कुमार, हरप्रीत विरदी, रमेश कुमार एवं प्रभजीत  जी शामिल हुए