संसार में कोई भी व्यक्ति योग्यता हीन पैदा नहीं होता ।प्रत्येक व्यक्ति में कोई ना कोई योग्यता है ।आवश्यकता है तो बस उस योग्यता को पहचान कर प्रयोग में लाने जय - 
साध्वी रूपिंदर भारती जी।

जालंधर:- दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा बिधिपुर आश्रम में एक दिवसीय सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया ।जिसमें  श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी रूपिंदर भारती जी ने कहा कि मानव में सहज सुलभ चार प्रकार के बल माने जाते हैं। एनरिक बल, मनोबल ,बौद्धिक बल और आत्मिक बल ।

अक्सर लोग अपनी जीवन की गाड़ी मनोबल के ईंधन से ही चलाते हैं। परंतु जीवन की दौड़ में कुछ ऐसे पल भी आते हैं जब यह इंदन खस्ता होने लगता है ।मनोबल के कमजोर होते ही हम आतम हीनता की गहरी खाई में लुढ़क जाते है। मन के निर्बल होने पर बुद्धि भी दामन झटक देती है और व्यक्ति भयंकर रूप से इंद्रियों के अधीन हो जाता है। गिरते हुए मनोबल को बढ़ाने का सशक्त मंत्र है, रचनात्मक एवं उत्साह पूर्ण विचारों का भरपूर सहारा ले। जिस का मनोबल गिर रहा है वह स्वयं को समझाएं कि किस प्रकार आज बड़े कहलाने वाले लोगों ने उत्कर्ष के क्रमिक विकास की सीढ़ियों को पार किया ।संसार में कोई भी व्यक्ति योग्यता हीन पैदा नहीं होता ।प्रत्येक व्यक्ति में कोई ना कोई योग्यता है ।

रचनात्मक एवं उत्साह पूर्ण विचारों का भरपूर सहारा ले - साध्वी रूपिंदर भारती जी।

आवश्यकता है तो बस उस योग्यता को पहचान कर प्रयोग में लाने की यदि हम अपनी क्षमताओं को हृदय से समझ लें और विकसित करें तो निसंदेह उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता ही होता है ।साध्वी जी ने कहा कि कई विद्वानों का यह मत भी है कि मनोबल मानवीय भावनाओं के उत्कर्ष का ही नाम है। परंतु हमारा विश्वास है कि मनोबल का मूल स्त्रोत व्यक्ति की अंतर आत्मा होती है। इसीलिए इसे निश्चित तौर पर आत्मा से संबंधित रखा जाना चाहिए ।यदि कोई व्यक्ति अपने मन बुद्धि का संबंध सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म से जोड़ लेता है ,परम ज्ञान को प्राप्त कर उसका निरंतर अभ्यास करता है तो उसके संकल्प में दृढ़ता और शुद्धता का समावेश होता जाता है ।जिसमें असाध्य कार्य भी साध्य हो जाते हैं। उदाहरण स्वरूप हम वानरों द्वारा मां सीता की खोज अभियान को ही ले ।

एक पड़ाव ऐसा आता है जब सभी वानर अपना मनोबल गिरा कर निराश हो जाते हैं । किंतु उसी क्षण सागर तट पर उदास बैठे हनुमान जी को जामवंत जी आत्मा समृद्धि करवाते हैं ।उन्हें याद दिलाते हैं कि उनमें कौन-कौन सी दिव्य शक्तियां निहित है और वह क्या-क्या कर सकते हैं ।इसी प्रकार हनुमान जी को जब स्वयं का ज्ञान होता है तो उनका मनोबल असाधारण रूप से बढ़ जाता है ।उनकेउत्साह को देखकर शेष वानरों में भी प्रबल ऊर्जा का संचार होता है यानी सूत्र वही है स्वयं को जानना ,अपनी आत्मशक्ति को पहचानना और उसका वर्णन करके मनोबली हो जाना । यह एक पूर्ण ब्रह्मनिष्ट सद्गुरु के द्वारा ही आत्मा का ज्ञान संभव हो पाता है ।अंत में साध्वी संदीप भारती जी ने समधुर भजनों का गायन किया।