यदि हम परमात्मा के द्वारा दिव्य स्वरूप का वास्तव में आनंद उठाना चाहते हैं तो हमें भी उनका अपने भीतर प्रत्यक्ष दर्शन करना होगा - साध्वी पल्लवी भारती।

जालंधर :- 31 जुलाई 2022-  दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से बिधिपुर आश्रम में सप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया ।जिसमें श्री आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी पल्लवी भारती जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से संगत को संबोधित करते हुए कहा कि परमात्मा उसके दिव्य स्वरुप को भी शब्दों या व्यक्तियों के दायरे में नहीं बांधा जा सकता ।यही कारण था कि सभी महापुरुषों व भक्तजन ध्यान द्वारा अपने अंतर जगत में उतर कर ज्ञान चक्षुद्वारा उन्होंने अपने भीतर ईश्वर उसकी ज्योति स्वरूप व अनेकानेक दिव्य नजारों का प्रत्यक्ष दर्शन किया। प्रभु को अपने भीतर प्रत्यक्ष देखने पर ही उनकी दिव्यता का प्रमाण मिलता है।


आध्यात्मिक विद्या की तो पूर्णता ही तभी होती है जब हम एक शाश्वत प्रक्रिया से गुजर कर अपने भीतर प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेते हैं - साध्वी पल्लवी भारती।

यदि हम परमात्मा के द्वारा दिव्य स्वरूप का वास्तव में आनंद उठाना चाहते हैं तो हमें भी उनका अपने भीतर प्रत्यक्ष दर्शन करना होगा । इस प्रक्रिया से गुजरना होगा जिससे गुजरकर महापुरुषों ने उन आंतरिक अनुभवों को प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि आज हम शास्त्रीय ग्रंथों में महापुरुषों के अनुभवों को केवल मात्र पढ़ने तक ही सीमित है ,लेकिन इसमें हमारा कल्याण कैसे हो सकता है जिस प्रकार एक विज्ञान के विद्यार्थी के लिए भी केवल विज्ञानिक समीकरणों व सिद्धांतों को पढ़ना ही काफी नहीं प्रयोगशाला में जाकर प्रयोगात्मक परीक्षण करना भी उनके लिए उतना ही जरूरी है ।साध्वी ने कहा कि जब जीवन के प्रत्येक व्यवहारी क्षेत्र में सफलता का सूत्र प्रयोगात्मक ज्ञान है फिर अध्यात्म के क्षेत्र में क्यों नहीं अध्यात्म तो विज्ञानों का भी विज्ञान है सभी विद्याओं का स्त्रोत है इस क्षेत्र में हम प्रत्यक्ष अनुभव की महत्वता को कैसे निकाल सकते हैं।
प्रभु को अपने भीतर प्रत्यक्ष देखने पर ही उनकी दिव्यता का प्रमाण मिलता - साध्वी पल्लवी भारती जी।

आध्यात्मिक विद्या की तो पूर्णता ही तभी होती है जब हम एक शाश्वत प्रक्रिया से गुजर कर अपने भीतर प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेते हैं। सभी शास्त्रों का मत है कि यह प्रक्रिया एक गुरु की शरणागति से ही आरंभ होती है । सतगुरु ब्रह्म ज्ञान प्रदान कर हमारे अंतर जगत का द्वार खोल देते हैं । द्वार खुलते ही हम प्रभु को का अपने भीतर प्रत्यक्ष दर्शन कर पाते हैं यही परंपरा सृष्टि के आरंभ से आज तक मान्य है और सदा मान्य रहेगी। अंत में साध्वी जसपाल भारती ने समधुर भजनों का गायन किया।