Movie Review
बावर्ची
कलाकार
राजेश खन्ना , जया भादुड़ी , ए के हंगल , काली बनर्जी , उषा किरण , दुर्गा खोटे , हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय , असरानी , मास्टर राजू और पेंटल
लेखक
तपन सिन्हा , ऋषिकेश मुखर्जी और गुलजार
निर्देशक
ऋषिकेश मुखर्जी
निर्माता
एन सी सिप्पी , रोमू एन सिप्पी और ऋषिकेश मुखर्जी
गीत-संगीत:
मदन मोहन, कैफी आजमी
रिलीज:
7 जुलाई 1972
रेटिंग
 
5/5

इन दिनों ओटीटी और सिनेमा के लिए मनोरंजन सामग्री बनाने वालों में ‘हिंदी हार्टलैंड’ की कहानियों की जबर्दस्त मांग है और दिक्कत ये है कि मुंबई के अंधेरी, जुहू, सांताक्रूज और बांद्रा में बसे नए फिल्मकारों को पता ही नहीं कि ये ‘हार्टलैंड’ कोई जगह नहीं बल्कि आम आदमी का दिल है। ये वही आम आदमी है जो अब भी रिश्तों के लिए रोता है। पिता से दूर है और बच्चों के लिए परेशान है। पत्नी की कहने पर घरवालों से भिड़ने को तैयार है और घर की बिटिया को पढ़ाने के लिए आने वाले नौजवान को शक की निगाह से देखता है। यही आम आदमी जब दिल खोलकर सिनेमा देखता है तो बॉक्स ऑफिस पर पैसों की बरसात होती है। और, ये सब समझने के लिए जरूरत है हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों को फिर से देखने की जो अपने जमाने की सुपरहिट फिल्में कहलाती हैं। बांग्ला फिल्म ‘गोल्पो होलेओ शोत्यि’ की रीमेक के तौर पर बनी ऐसी ही एक हिंदी फिल्म है ‘बावर्ची’। ये फिल्म 7 जुलाई 1972 को पहली बार बड़े परदे पर उतरी।

ऋषिकेश मुखर्जी ने सजाया रंगमंच

ऋषिकेश मुखर्जी मशहूर निर्देशक बिमल रॉय के लंबे समय तक फिल्म एडीटर रहे। सिर्फ उनकी फिल्मों को देखकर फिल्म संपादन की कला में महारत हासिल की जा सकती है। राजेश खन्ना को सेट पर ही झाड़ देने वाले वह अपने जमाने के इकलौते फिल्म निर्देशक रहे। फिल्म ‘बावर्ची’ के हीरो राजेश खन्ना ही हैं और उनकी एंट्री फिल्म में होती है तकरीबन आधे घंटे बाद। उससे पहले ऋषिकेश मुखर्जी अपने हीरो के लिए एक मंच तैयार करते हैं। फिल्म शुरू भी बिल्कुल रंगमंच की तरह होती है। परदा पड़ा हुआ है। पीछे से अमिताभ बच्चन की आवाज आ रही है। फिल्म के सारे कलाकारों का परिचय सिर्फ बोलकर कराने का ऋषिकेश मुखर्जी ने ये अद्भुत प्रयोग फिल्म ‘बावर्ची’ में किया। ऐसा अमूमन नाटकों में होता है लेकिन फिल्म ‘बावर्ची’ बनी ही किसी नाटक की तरह है। हर पात्र का अपना अलग आभामंडल और कहानी का अधिकतर भूगोल सिर्फ एक घर में सिमटा हुआ। शांति निवास नामक इस घर से फिल्म की कहानी गिनती के दृश्यों में ही बाहर जाती है।

संयुक्त परिवार की रोचक कहानी

फिल्म ‘बावर्ची’ कहानी है एक ऐसे संयुक्त परिवार की जिसके मुखिया यानी दादूजी अपनी कमाई से बनाए जेवर अपने बिस्तर के नीचे रखे संदूक में ताला लगाकर रखते हैं। घर में दो बहुएं हैं, दोनों का काम से जी घबराता है। अपने पतियों के लिए वे बिस्कुट अलमारी में छुपा कर रखती है। घर में एक अनाथ बेटी है। माता पिता उसके दुर्घटना में मारे गए। हर कोई उस पर रौब जमाता है। बड़े भाई की बेटी को नृत्य सिखाने एक स्त्रैण लक्षणों वाले गुरुजी आते हैं। छोटे भाई का बेटा अभी बहुत छोटा है। तीसरा भाई अंग्रेजी रिकॉर्ड्स की धुनें चुराकर नए हिंदी गाने बनाने में माहिर नजर आता है। कोई किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता। सबको एक दूसरे पर शक भी है और डाह भी और फिर घर में आता है नया बावर्ची। वह कहने भर को बावर्ची है। संस्कृत का विद्वान है। गणित के फॉर्मूले चुटकियों में हल कर देता है। नृत्य में प्रवीण है और गाने बैठ जाए तो अच्छे अच्छे गायक उसके आगे फेल हैं। ये बावर्ची घर के लोगों को एक दूसरे से प्यार करना सिखाता है, दूसरों की छोटी मोटी गलतियों को नजरअंदाज करना सिखाता है। और, कहता है, ‘अपना काम तो सभी करते हैं, लेकिन दूसरों का काम करने में जो सुख मिलता है, उसका अलग ही आनंद है।’ गुलजार ने चुन चुनकर पारिवारिक जीवन को सुलझाने के संवाद फिल्म में लिखे हैं।

गुसलखाने में बर्तन मांजते दिखे राजेश खन्ना

एक फिल्म को संपूर्ण फिल्म कैसे बनाया जा सकता है, उसे सिखाने के लिए फिल्म ‘बावर्ची’ बिल्कुल सही उदाहरण है। राजेश खन्ना को उनकी रोमांटिक छवि से निकालकर गुसलखाने के पास बैठकर बर्तन मांजने का काम अपनी फिल्म में ऋषिकेश मुखर्जी ही दे सकते थे। और, ये राजेश खन्ना जैसा अभिनेता ही कर भी सकता है। राजेश खन्ना उन दिनों रोमांटिक हीरो वाली शोहरत के रथ पर सवार थे और इस फिल्म में तो उनके पास हीरोइन ही नहीं थी। फिल्म की हीरोइन जया भादुड़ी हैं जिनका किरदार है घर की अनाथ बेटी कृष्णा का और वह इस बावर्ची को भैया कहकर बुलाती है। राजेश खन्ना ने इस फिल्म में अपना सुपरस्टारडम उतारकर कहीं कोने में रख दिया है। यहां वह एक आम इंसान हैं। एक हंसता मुस्कुराता आम इंसान जिसका जन्म बनारस में हुआ। पढ़ लिखकर वह यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर बना। अपनी खुशी के लिए उसने हर हुनर सीखा लेकिन जब लगा कि ऐसा हुनर किसी काम का नहीं जो दूसरों को सुख न दे सके तो दूसरों के घर में नौकरी करके उनको सुख के मायने सिखाने निकल पड़ा। सोचता है एक घर बदलेगा, फिर 10 घर बदलेंगे, फिर हजार घरों में शांति होगी और लोग ऐसे ही एक दूसरे को प्यार करने लगेंगे। वह बहता पानी है जिसके जल का एक आचमन भी कलह में डूबे घरों को सुख के किनारे पर ले आता है। राजेश खन्ना का रघु वाला ये रूप ठीक असली राजेश खन्ना जैसा है। वह कहते थे, “मैं तो हर रोज नई जिंदगी जीता हूं। शाम हुई, सो गए। अगर अगली सुबह आंख खुल गई तो फिर एक नया जीवन। नहीं तो किसको पता कि कब आंख लगे और फिर लगी ही रह जाए।”

हर किरदार का अलग आभामंडल

फिल्म के हीरो राजेश खन्ना के आसपास जो किरदार दिखते हैं, वे ही फिल्म ‘बावर्ची’ की रेसिपी के असली मसाले हैं। रिटायरमेंट के करीब बेटे का किरदार निभाने वाले ए के हंगल को इस बात पर कोफ्त होती है कि अपने पिता की नजरों में वह अब भी बचपन में मिले नाम मुन्ना जैसे ही हैं। काली बनर्जी अध्यापक के रूप में जंचे हैं। बड़ी बहू का किरदार दुर्गा खोटे को मिला और छोटी बहू का उषा किरण को। देवरानी-जेठानी के बीच चलने वाली तनातनी को जिस अंदाज से बावर्ची रघु खत्म करता है, वह सीखने वाली बात है। दोनों भाइयों में भी वह ऐसे ही प्रेम बोता है। एक ही छत के नीचे रहने वाली चचेरी बहनों की आपसी ईर्ष्या भी रघु की कोशिशें से पानी पानी होती है। और, कृष्णा को अपना प्यार भी रघु के फाइनल एक्ट से ही मिलता है। फिल्म ‘बावर्ची’ इन सब कलाकारों को पनपने का, उनके अभिनय का रस परदे पर बिखरने देने का और इन किरदारों को कहानी के अलग अलग अहम अंग बनकर सामने आने का पूरा मौका देती है और ये संभव हो पाता है ऋषिकेश मुखर्जी के सधे हुए निर्देशन से।

कैमरे की कलाबाजी का कमाल

फिल्म की तकनीकी टीम भी अपने काम में मुस्तैद है। दृश्यों की पृष्ठभूमि में कहीं रामकृष्ण परमहंस की समाधिस्थ फोटो टंगी है। कला निर्देशक अजित बनर्जी बड़ी सावधानी से कृष्णा के कमरे में ब्रुक बॉन्ड चाय और डालडा के खाली डिब्बे सजा देते हैं। पूरा घर वह एक मध्यमवर्गीय परिवार के घर जैसा ही बनाते हैं। जयवंत पठारे की सिनेमैटोग्राफी नायाब है। कैमरे की सहजता क्या होती है, ये देखना हो तो फिल्म का आखिरी गाना ‘भोर आई गया अंधियारा..’ ध्यान से देखिए। परदे पर रघु और दोनों चचेरी बहनें जब एक साथ गाना गाती हैं और कैमरा जूम इन, जूम आउट होता है तो कैमरे की सहजता देखने लायक हैं। कहीं कोई जर्क नहीं, कहीं कोई आउट ऑफ फोकस नहीं। पूरी फिल्म में तमाम लंबे लंबे दृश्य हैं जिनमें जयवंत पठारे की कैमरे की साधना दिखती है। कैफी आजमी और मदन मोहन की गीत संगीत की जुगलबंदी भी अद्भुत है। मन्ना डे तो खैर शास्त्रीय संगीत में निपुण गायक हैं ही, किशोर कुमार ने भी उनका अच्छा साथ ‘भोर आई गया अंधियारा..’ में दिया है। मन्ना का गाया एक और गाना ‘तुम बिन जीवन..’ फिल्म का याद रह जाने वाला गाना है।

इसलिए जरूर देखें

ऋषिकेश मुखर्जी की ही फिल्म ‘आनंद’ का वह संवाद तो आपको याद ही होगा, ‘बाबूमोशाय, जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए’। फिल्म ‘बावर्ची’ में गुलजार ने एक और जीवन दर्शन लिखा है, ‘इट इज सो सिंपल टू बी हैप्पी, बट इट इज सो डिफिकल्ट टू बी सिंपल’ मतलब खुश होना बहुत साधारण बात है, लेकिन जीवन में साधारण बने रहना बहुत मुश्किल है। या फिर कि ‘लोग जिंदगी का सबसे छोटा, सबसे कीमती लफ्ज भूल गए हैं, प्यार…’। इस सप्ताहांत अगर आपको पूरे परिवार के साथ बैठकर देखने को कुछ न सूझ रहा हो तो अपने स्मार्ट टीवी पर खोलिए प्राइम वीडियो और सबके साथ मिलकर देख डालिए, निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘बावर्ची’।

चलते चलते..

फिल्म ‘बावर्ची’ की शूटिंग के दिनों में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी का प्रेम प्रसंग भी अपने उनवान पर था और इसे लेकर राजेश खन्ना काफी उल्टा सीधा भी बोलते थे। अमिताभ बच्चन का वह सेट पर काफी मजाक उड़ाते और एक दिन दुखी होकर जया बच्चन के मुंह से निकल गया, एक दिन जमाना देखेगा कि ये कहां होगा और आप कहां होगे? किसी का दिल बहुत दुखा हो और उस वक्त उसके मुंह से कोई बात निकल जाए तो लोग कहते हैं कि सच होकर रहती है। और, खुद राजेश खन्ना ने बावर्ची के अगले साल रिलीज फिल्म ‘नमक हराम’ में मान लिया कि उनके दिन पूरे हुए अब बारी नए सुपर सितारे की है। जिंदगी ऐसे ही चलती रहती है। रस्सी खींचकर साधे रहने में जब हथेलियां छिलने लगें तो रस्सी छोड़ देनी चाहिए।