भजनों का सुरबद्ध गायन अन्य शिष्याएं साध्वी रीता भारती, रणे भारती, रजनी भारती , प्रियंका भारती एवं संदीप भारती जी के द्वारा किया गया।


 दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा अय्यप्पा मंदिर , गुरु गोविंद सिंह एवीन्यू में नवरात्रों के उपलक्ष में एक दिवसीय "शक्ति आराधन" भजन संध्या का आयोजन किया गया।  जिसमें श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी आणिमा भारती जी ने नवरात्रों के पर्व की महानता को  श्रद्धालु के समक्ष रखा। कार्यक्रम में भजनों का सुरबद्ध गायन अन्य शिष्याएं साध्वी रीता भारती, रणे भारती, रजनी भारती , प्रियंका भारती एवं संदीप भारती जी के द्वारा किया गया।


साध्वी जी ने बताया कि इस पर्व को मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है, यह कथा भी कुछ  कम संदेशात्मक नहीं है कथा उस समय की है, जब धरती माता महिष आदि असुरों के अत्याचारों से आक्रांत थी, इनके दानवी कुकृतियों से  चहुं और त्राहि त्राहि व हाहाकार मचा हुआ था ऐसे में सभी देवगण एकत्र हुए और उस परम शक्ति महामाई दुर्गा का आवाहन किया । मां दुर्गा विकराल रुद्र रूप धारण कर प्रकट हुई और इन दैतों से भीषण  संग्राम किया। यह संग्राम नौ दिन और नौ रातों तक  लगातार चलता रहा। अंत में दशम दिवस के सूर्य उदय के साथ मां दुर्गा ने इस समस्त आसुरी शक्तियों को  परास्त कर दिया,  महिषासुर का मर्दन कर  अपना विजय नाद उद्घोषित किया, बस तभी  से उस युद्ध काल के यह नौ। दिन  नवरात्रों के  रूप में देवी मां की पूजा वंदना में समर्पित किए जाते हैं ।लेकिन हमारे समाज की यह विडंबना है कि कथा तो हम सभी जानते हैं, पर इसकी अंतर निहित अध्यात्मिक भाव से अनभिज्ञ है।   


इस कथा का एक-एक पहलू प्रतीकात्मक है । हमें प्रेरणा दे  रहा है,  कुछ समझा रहा है  कि महिषासुर हमारे मन में स्थित  तामसी प्रवृत्तियों का प्रतीक हैं , आलस्य,  जड़ता, अविवेक, कामुकता और तमोगुण महिष के ही विभिन रूप है।  पर यह भी एक शाश्वत सत्य हैं कि जहां हमारे भीतर इन आसुरी प्रवृत्तियों का  का बोल बाला है , वहीं इन का हनन कर सकने वाली परम शक्ति जगदंबा भी अंतर में ही  विद्यमान है, इसलिए एक पूर्ण सद्गुरु की शरण में जाकर ही हम अपने घर में उतर कर उस देवी मां के प्रकाश स्वरूप का दर्शन कर सकते हैं ।  इस तथ्य की पुष्टि करते हुए दुर्गा सप्तशती में आता है , जो देवी सब भूत प्राणियों में चेतना रूप में   निवास करती है , उसे हम नमन करते हैं । नवरात्रों का यह पर्व हमें यह संदेश देता है हम अपनी सात्विक प्रवृत्तियों, शुभ संकल्पों को एकत्र करें । ऐसा तभी संभव है , जब मनुष्य की अंतर चेतना दो भृकुटिओ के मध्य में स्थित हो जाती है। यही अध्यात्मिक विजय दशमी है।