गौतम बुद्ध जो की महात्मा बुद्ध, भगवान बुद्ध, सिद्धार्थ व शाक्यमुनि नाम से भी जाना जाता है उनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। महात्मा बुद्ध ने नश्वर संसार के ताप-कष्टों को दूर करने तथा जीवन का रहस्य जानने के लिए गृहत्याग किया और लंबे समय तक काया-कष्ट सहकर ज्ञान प्राप्त किया; उन्हें जीव-जगत् का बोध हुआ, इसलिए वे 'बौद्ध' कहलाए। उन्होंने मानवता को अहिंसा का उपदेश दिया। कोई गूढ़ या ज्ञान की बात कितनी भी सरल भाषा में कही जाए, तो भी संपूर्ण समझ में नहीं आ पाती है। लेकिन उसे कहानी का रूप दे दिया जाए तो वह सहज ही हमेशा के लिए याद हो जाती है। महात्मा बुद्ध की ये कहानियाँ ऐसी ही हैं। इसमें उनके जीवन की घटनाओं तथा शिक्षाओं को सीधी-सरल भाषा में कहानियों के माध्यम से बताया गया है। ये छोटी-छोटी कहानियाँ अपने आप में अलग-अलग हैं और एक-दूसरी से जुड़ी हुई भी। लेकिन फिर भी कथा- रस से भरपूर हैं। संकलित अहिंसा, सदाचार, परोपकार और मानवीय मूल्यों को बतानेवाली रोचक-प्रेरक कहानियों का एक संग्रह है .


गौतम बुद्ध को कैसे मिली ज्ञान ?

राजा के यहाँ बुद्ध का जन्म हुआ। पिता ने ज्योतिषियों को बुलाकर भविष्य पूछा।

उन्होंने कहा, '“या तो यह सम्राट्‌ होगा और या तो यह साधु होगा।

एक तरह से देखा जाए तो सच्चा सम्राट्‌ भीतर से साधु ही होता है। जब ज्योतिषियों की भविष्यवाणी राजा ने सुनी तो वे घबरा गए कि मेरा बेटा साधु हो जाए, ऐसा ठीक नहीं होगा। राजा ने पूछा, ““कोई उपाय बताएँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि राजा का पुत्र राजा ही बने ।”' ज्योतिषियों ने कहा कि इसका लालन-पालन व पूरा जीवन बड़ी सावधानी में बिताना होगा।

अर्थात्‌ आपका पुत्र सिद्धार्थ कभी किसी बूढ़े व्यक्ति को न देखे, कभी किसी बीमार व्यक्ति को न देखे और कभी किसी मरे हुए व्यक्ति को न देखे । जब तक ऐसा होगा तब तक वे राजा ही बने रहेंगे, अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे साधु बन जाएँगे।

राजा शुद्धोधन ने अपने पुत्र सिद्धार्थ के लिए बढ़िया-से-बढ़िया, बड़े-बड़े महल, अच्छे-से-अच्छा भोजन, दास-दासियाँ और खाने-पीने के सामान आदि वस्तुओं के ढेर लगा दिए।

पिता ने पुत्र को सुख-सुविधाओं में इतना उलझा दिया कि उसे बाहर का संसार याद ही नहीं आया। शुद्धोधन ने समझ लिया कि अब इतने सुखों के आगे साधु बनने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। वे निश्चित हो गए।

राजा शुद्धोधन ने बिल्कुल पक्की व्यवस्था कर रखी थी कि उनका पुत्र सिद्धार्थ जीवन में कभी भी वृद्ध, बीमार और मृतक व्यक्ति को देख न सके, क्योंकि वे अपने पुत्र को खोना नहीं चाहते थे।

सिद्धार्थ का जीवन :

ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं में बीत रहा था। उनके जवान होने पर एक सुंदर कन्या यशोधरा से उनका विवाह हो गया।

विवाह हो जाने पर शुद्धोधन की आधी चिंता मिट गई, अब तो शादी हो गई, अब कहाँ जाएगा? अब तो मेरा पुत्र बंधन में बँध गया है। अब उसके कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता।

एक वर्ष बाद बेटे का भी जन्म हो गया। उसका नाम राहुल रखा गया। अब राजा शुद्धोधन को बिल्कुल पक्का विश्वास हो गया कि अब यह कहीं नहीं जा सकता। एक दिन सिद्धार्थ ने कहा कि पिताजी ! आज तक मैंने कभी अपनी राजधानी नहीं देखी।

आपकी आज्ञा हो तो आज देख आऊँ। राजा ने कहा, “'हाँ-हाँ, अवश्य जाओ, अपना शहर देखकर आओ।”” एक सारथी को भी साथ में भेजा गया कि जाओ राजकुमार को राजधानी घुमा-फिराकर लाओ। फिर भी राजा ने चाक-चौबंद इंतजाम कर रखा था कि कहीं चूक न हो जाए।

सिद्धार्थ के लिए राजधानी के प्रमुख मार्ग खूब सजाए गए थे, पर घूमते- घूमते सिद्धार्थ ने थोड़ा उलटा मार्ग ले लिया।

वे उस मार्ग से गुजरने लगे, जहाँ पर तैयारी नहीं थी और आज उनको बहुत आश्चर्य हुआ, जब पहली बार उन्होंने एक बूढ़े आदमी को देखा, कमर झुकी हुई, पूरी चमड़ी में झुरियाँ पड़ी थीं। वह परेशानी और दुःख से बेहाल था। उसकी चाल बहुत धीमी थी। बूढ़े की झुकी हुई कमर को देखकर सिद्धार्थ को एक झटका लगा और सारथी से उन्होंने पूछा, “क्या एक दिन मैं भी बूढ़ा हो जाऊँगा ?''

सारथी ने कहा, “' हाँ राजकुमार ! हर व्यक्ति के जीवन में तीन अवस्थाएँ . आती हैं--बचपन, जवानी और बुढ़ापा । एक दिन तुम भी बुढ़ापे की अवस्था में जाओगे। हे राजकुमार! यह संसार का नियम है। चाहे गरीब हो या अमीर, सबका शरीर शिथिल अर्थात्‌ बूढ़ा होता है।''

राजकुमार सोच में पड़ गया। सारथी ने रथ को आगे बढ़ाया तो कुछ दूरी पर एक बीमार व्यक्ति मिला, जो रोगों से घिरा हुआ था। उस पीड़ित व्यक्ति को देखकर राजकुमार का मन बहुत ही दुःखी हुआ।

राजकुमार ने पूछा, “इसको क्या हुआ है ?'' सारथी ने कहा, ''यह व्यक्ति बीमार है, इसलिए यह कराह रहा है। इस संसार में दुःख और सुख दोनों हैं। यह अपने-अपने भाग्य की बात है कि कोई दुःखी है और कोई सुखी है।'' “क्या मैं भी कभी बीमार हो सकता हूँ ?” सारथी ने कहा, आप यह विचार अभी छोड़ दें।

समय बड़ा बलवान होता है। ये सारी बातें कर्मों पर निर्भर करती हैं।''

चाहे राजा हो या रंक, सुख-दुःख सब पर आते हैं। अगर शरीर में कोई रोग आना है तो वह आएगा। यह सब सुनकर राजकुमार सोच में पड़ गया। सारथी ने रथ को कुछ आगे बढ़ाया तो सामने से चार कंधों के ऊपर एक अरथी को जाते हुए देखा।

राजकुमार ने ऐसा पहली बार देखा था। उसने सारथी से पूछा, ““यह क्या है ?”” “यह आदमी मर गया है। यह मुरदा है। जो व्यक्ति मर जाता है, उसको बाँधकर श्मशान भूमि में ले जाते हैं। फिर वहाँ पर उसे जला दिया जाता है।''

राजकुमार ने कहा, “क्या सबको मरना पड़ता है ?'' “हाँ, सबको मरना पड़ता है। यह मृत्युलोक है। जो जन्म लेता है, उसे कभी-न-कभी अवश्य ही मरना पड़ता है। ““तो इसका मतलब यह हुआ कि ठीक इसी तरह से एक दिन मुझे भी मरना होगा, मेरी देह भी मुर्दा होगी और मुझको भी चार कंधों पर उठाकर ले जाया जाएगा।

मुझको भी ऐसे ही रस्सियों से बाँधा जाएगा। मेरे भी आगे-पीछे घर के सदस्य रोएंगे-तड़पेंगे और जिस संसार को मैंने इकट्ठा किया है, वह सारा-का-सारा मुझ से छूट जाएगा।

इसका मतलब यह हुआ कि क्या एक दिन मैं भी मर जाऊँगा ? क्‍या एक दिन यशोधरा भी मर जाएगी ? क्‍या एक दिन मेरा राहुल भी मर जाएगा ? सारथी ने कहा, “हाँ, राजकुमार ! एक दिन मैं भी मरूँगा, आप भी मरेंगे, यशोधरा भी मरेंगी और राहुल भी मरेगा, क्योंकि यह सब मरने के लिए ही पैदा होते हैं।

उस रात सिद्धार्थ सो न सके, सोचने लगे कि क्या संसार में इतना दुःख है, रोग है, बुढ़ापा है, और ऐसे में मैं खा-पीकर कैसे जी सकता हूँ ? नहीं-नहीं, ऐसा मुझसे नहीं हो सकता।

मुझे खोजना होगा उस तत्त्व को जो दुःख, पीड़ा और शोक से रहित हो, जो भय, भ्रम और भूल से परे हो, जो अनंत आनंद से भरा हो।

जिसे पाकर फिर और कुछ पाने की इच्छा न हो। सिद्धार्थ वैराग्य के शिखर तक पहुँच चुके थे। बस उसी रात को उन्होंने घर छोड़ दिया। सारथी से कहा कि नगर की सीमा से दूर ले चलो।

नगर के बाहर पहुँचकर सारथी को लौटा दिया। फिर, कई दिनों तक वन में चलते गए। एक घने पीपल के वृक्ष के नीचे आसन लगाकर ध्यान में लीन हो गए।

“सिद्धांत और व्यवहार में परिवर्तन

गौबुद्ध के जीवन की एक घटना है।

उन्होंने नियम बना रखा था कि वे अपने संघ में स्त्रियों को स्थान नहीं देंगे।

स्त्रियों के लिए भिक्षु होने की दीक्षा उन्होंने वर्जित कर रखी थी।

एक समय गौतम बुद्ध एक गाँव में ठहरे हुए थे। वहाँ महाप्रजापति गौतमी उनके पास पहुँचीं।

उन्होंने बुद्ध से कहा, “आप स्त्रियों को भी दीक्षा दें।'” किंतु बुद्ध ने अस्वीकार कर दिया।

अनेक स्त्रियाँ इकट्ठी हुईं और उन्होंने विचार किया कि कैसे गौतमबुद्ध से स्वीकृति प्राप्त की जाए ?

स्त्रियों ने निर्णय लिया कि स्वयं सेविकाएँ बनकर गौतम बुद्ध के समक्ष पहुँचा जाए।

गौतमी ने अपने बाल काटे, भिक्षु के वस्त्र पहने और अनेक स्त्रियों के साथ बुद्ध के सामने पहुँच गईं।

उनकी यह माँग थी कि स्त्रियों को भी दीक्षा दी जाए। बुद्ध ने उनकी बात को स्वीकार नहीं किया। स्त्रियाँ निराश हुईं।

जब बुद्ध के एक शिष्य आनंद ने स्त्रियों को देखा, उनके पाँव सूजे हुए थे। उन पर धूल चढ़ी हुई थी, उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

उन्होंने पूछा, “क्या बात है ?”

स्त्रियों ने कहा, “बुद्ध उनके धर्म और नियम के अनुसार हमें भिक्षु होने की दीक्षा नहीं दे रहे हैं।'' जब आनंद ने व्यक्तिगत रूप से बुद्ध से निवेदन किया।

बुद्ध को उन्होंने याद दिलाया, ''इस समय यह सामाजिक मान्यता है कि स्त्रियाँ मोक्ष की अधिकारी नहीं हैं, पुरुषों के मुकाबले निम्न हैं तो क्या आप भी यह मानते हैं और इसलिए उन्हें दीक्षित नहीं कर रहे हैं ?” बुद्ध का उत्तर था, “मुझे गलत न समझा जाए।

मेरी मान्यता है कि पुरुष की तरह ही स्त्री भी निर्वाण प्राप्त कर सकती है,

लेकिन मैं कुछ व्यावहारिक कारणों से स्त्रियों को संघ में शामिल करने और दीक्षा देने की स्वीकृति प्रदान नहीं कर रहा हूँ।

आनंद का उत्तर था, “सिद्धांत और व्यवहार में परिवर्तन करना चाहिए।”' बुद्ध को बात जँच गई और उन्होंने यह घोषणा की, “जो स्त्रियाँ भिश्लु होना चाहेंगी, उन्हें कुछ नियमों का पालन करना होगा।”

स्त्रियों ने स्वीकार किया और तब से स्त्रियाँ भी बौद्ध बनने लगीं।

बुद्ध की दृष्टि

गौबुद्ध एक बार अपने शिष्यों के साथ प्रवास पर निकले।

एक नगर से दूसरे नगर तक जाने की राह में वन पड़ता था।

वन क्षेत्र में प्रवेश करने के साथ ही कुछ दूर चलने पर बुद्ध एक जगह रुक गए पीछे आ रहे शिष्यों का समूह भी उन्हें देख उसी स्थान पर रुका।

लेकिन वहाँ रुके रहना शिष्यों के लिए मुश्किल हो गया, क्योंकि सामने एक क्षत- विक्षत शव पड़ा था और उसकी दुर्गध वातावरण में फैल रही थी।

शिष्यों ने अपने वस्त्र से नाक बंद कर ली, लेकिन बुद्ध शव की ओर टकटकी लगाए देखते रहे ।

एक शिष्य ने साहस कर विनग्रतापूर्वक गौतम बुद्ध से अनुरोध किया, “ भगवान्‌, यहाँ से शीघ्र चलना ही उचित होगा।

यहाँ शव पड़ा है और बहुत दुर्गध आ रही है। बुद्ध मुसकराए और शिष्यों की ओर उन्मुख होते. हुए बोले, “बताइए इस सबमें सौंदर्य दिखाई देता है ?”' शिष्यों ने कहा, “' भगवन्‌, यह कैसा प्रश्न है ?

सौंदर्य और शव में! जीवन था तब तक सौंदर्य, अब तो सब समाप्त हो गया।'' बुद्ध ने शव की ओर इशारा करके बताया, “देखो जब कभी यह व्यक्ति जीवित रहा होगा, इसकी दंत पंक्तियाँ अद्वितीय रही होंगी।

मृत्यु के बाद भी इसके दंत देखकर यही साबित होता है।'” वहाँ खड़े सभी शिष्यों ने दृष्टि डाली, तो पाया बुद्ध सही कह रहे थे। तब शिष्यों को भान हुआ कि शव में भी अच्छाई हो सकती है।

दरअसल सौंदर्य निर्जीव में भी नजर आ सकता है, केवल शर्त यह है कि दृष्टि बुद्ध के समान बुराई में भी अच्छाई देखनेवाली होनी चाहिए ।

गुलाब की एक शाखा में फूल की तुलना में काँटें ही अधिक होते हैं, पर हम फूल चुनते हैं, काँटें नहीं।

ठीक इसी तरह किसी में सौ बुराइयाँ नहीं, अच्छाई देखनी चाहिए।

ज्ञान और कर्म

भगवान बुद्ध के प्रवचन सुनने के लिए एक व्यक्ति नियमित रूप से आता था।

इस प्रकार उसे एक माह हो चुका था, किंतु उसके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

भगवान्‌ बुद्ध उपदेश में कहते थे कि धर्म पर चलो, अपने जीवन से राग-द्वेष को दूर करो; काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से सदा दूर रहो।


बुद्ध के उपदेशों से लोगों को बहुत शांति मिलती थी, किंतु उस व्यक्ति का मन अशांत रहता था।

एक दिन उसने बुद्ध से जाकर कहा, “' हे प्रभु ! मैं एक माह से आपका उपदेश सुन रहा हूँ, किंतु उसका तनिक भी असर मेरे आचरण पर नहीं पड़ा।

मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे क्या करना चाहिए ?” बुद्ध उनकी बात सुनकर बोले, “तुम कहाँ के रहने वाले हो ?'” उसने कहा, “श्रावस्ती का।”' बुद्ध ने अगला प्रश्न किया, “वह यहाँ से कितनी दूर है।”” उसने अनुमान से बता दिया।

बुद्ध ने पुनः जिज्ञासा प्रकट की, ““कितना समय लगता है ?'' उस व्यक्ति ने हिसाब लगाकर बता दिया। बुद्ध ने क्रहा, “' अब बताओ कि क्‍या तुम यहाँ पर बैठे-बैठे ही अपने घर पहुँच सकते हो ?” उसने कहा, “यह कैसे हो सकता है ?

वहाँ पहुँचने के लिए तो चलना होगा।'' तब बुद्ध ने बड़े प्रेम से उसे समझाया, “जैसे चलने पर ही पहुँचा जा सकता है, वैसे ही अच्छी बातों पर अमल करने से ही लाभ होता है।

हे प्यारे! तुम मेरे ज्ञान के साथ अपने कर्म को जोड़ दो, तब तुमको उत्तम फल मिलेगा।”

उस व्यक्ति को अपनी गलती समझ में आ गई । उसने अपने जीवन में सुधार कर लिया, जिससे उसका जीवन सदाचारी बन गया।

आत्म-साक्षात्कार आवश्यक है

जीवन में एक अज्ञात भय ऐसा है जो ज्ञात भी है,परंतु है सबसे बड़ा और वह है मृत्यु का भय ।

उम्र, मौत और जिंदगी, इन तीनों के मामले में संसारी और साधु का फर्क देखें तो भयमुक्त हुआ जा सकता है।

संत कितना जिए, यह महत्त्वपूर्ण नहीं होता, कैसे जिए यह उपयोगी होता है।

देह त्यागने के पूर्व बुद्ध ने जो अंतिम वाक्य कहे थे, उसे समझा जाना चाहिए, “'हंद दानि भिक्खवे आमंत यामि वो, वह धमा संरवारा अप्पमादीन संपादे था इति।''

अर्थात्‌ हर बस्तु नाशवान है, जीवन का संपादन अप्रमाद के साथ करो।

आलस्य के साथ वासना का समावेश हो जाए तो प्रमाद शुरू होता है।

बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को अपनी अंतिम क्रिया के बारे में भी विस्तार से समझा दिया था। मौत को उन्होंने उत्सव बनाया।

भौतिकता की आँधी में आज हम इतने भयभीत हैं कि साँप को तो मार देते हैं और रस्सी से डर जाते हैं ।

हमारी मौत अवसाद तथा संतों की मृत्यु उपदेश हो जाती है।

इसे दिव्य बनाने का प्रयास उम्र के हर पल में और जिंदगी के हर पड़ाव पर सतत करना होगा।

कहते हैं, जब बुद्ध संसार से गए तो उनकी उम्र अस्सी वर्ष थी, लेकिन संत समाज मानता है कि वे चालीस साल के थे, क्‍योंकि जब वे चालीस वर्ष के थे तब एक पीपल के वृक्ष के नीचे सात दिन सतत समाधि में रहे और तब ही उन्हें पूर्णिमा के दिन बुद्धत्व प्राप्त हुआ था।

उसके बाद वे चालीस वर्ष और जीवित रहे।

अध्यात्म कहता है उम्र तो उसी को मानेंगे, जिन क्षणों में आप स्वयं को जान गए।

इसलिए याद रखें “कितना जिए' यह संसार का समीकरण है, 'कैसा जिए' यह अध्यात्म का गणित है।

ज्ञान को सावधानी से सुनना चाहिए

महात्मा गौतम बुद्ध के श्रावस्ती में प्रवचन चल रहे थे।

प्रवचन में नित्य ही बड़ी संख्या में लोग आते और विविध महत्त्वपूर्ण व गंभीर विषयों पर बुद्ध से ज्ञान ग्रहण करते।

बुद्ध का शिष्य वर्ग भी काफी विशाल था, जो प्रवचन स्थल की व्यवस्था सँभालता और बुद्ध की सेवा में सदैव तत्पर रहता।

एक बार रात के समय महात्मा बुद्ध प्रवचन दे रहे थे। सदैव की भाँति काफी लोग उनके प्रवचन सुन रहे थे।

एक व्यक्ति जो बुद्ध के ठीक सामने बैठा था, बार-बार नींद के झोंके ले रहा था।

बुद्ध थोड़ी देर तक तो प्रवचन देते रहे, फिर उससे बोले,वत्स, सो रहे हो ?

उस व्यक्ति ने हड़बड़ाकर कहा, नहीं महात्मा। बुद्ध ने पुनः प्रवचन प्रारंभ किए।

वह व्यक्ति फिर ऊँघने लगा। महात्मा ने फिर वही प्रश्न दोहराया और उसने फिर अचकचाकर “नहीं महात्मा'” कहा।

ऐसा लगभग आठं-दस बार हो गया। कुछ देर बाद बुद्ध ने उससे पूछा, वत्स, जीवित हो ?

हर बार की तरह इस बार भी उसने कहा, “नहीं महात्मा।' यह सुनकर उपस्थित श्रोताओं में हँसी की लहर दौड़ गई और वह व्यक्ति पूर्णत: चैतन्य हो गया।

तब बुद्ध गंभीर होकर बोले, “वत्स! निद्रा में तुम्हारे मुख से सही उत्तर मिल ही गया। जो निद्रा में है, वह मृतक समान ही है।

महात्मा बुद्ध का संकेत था कि गुरु से ज्ञान ग्रहण करते वक्‍त सजगता अत्यंत आवश्यक है।

गाफिल रहने की स्थिति में ज्ञान की प्राप्ति पूर्ण नहीं होती और अधकचरा ज्ञान सदैव खतरनाक साबित होता है।

बुद्ध की एकाग्रता

एक के बार भगवान्‌ बुद्ध एक गाँव के समीप एक शाला में निवास कर रहे थे।

दिन का समय था।

आकाश में घटाएँ घिर रही थीं।

थोड़ी ही देर में मूसलधार बारिश होने लगी।

आस-पास के लोगों में अपने बाहर रखे सामानों को हटाने की हड़बड़ी मच गई।

इसी आपाधापी में कुछ लोग गिर भी गए और उन्हें चोट आई।

तभी जोर से बिजली कड़की और वहीं काम कर रहे दो किसानों एवं चार बैलों को अपनी चपेट में ले लिया।

इन सभी कौ तत्काल मृत्यु हो गई। इस हादसे के कारण वहाँ भारी भीड़ एकत्रित हो गईं।

उस समय भगवान्‌ बुद्ध वहीं शाला के बरामदे में टहल रहे थे। लोगों ने उन्हें घटना के विषय में बताया, तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की।


ग्रामीणों से उनका वार्त्तालाप कुछ ऐसे चला, “'भंते। आप उस समय कहाँ थे?”

बुद्ध बोले, “आयुष्मान्‌! यहीं था।

आपने बादलों को घुमड़ते और बिजली को चमकते देखा? ''

“नहीं देखा।

“भंते। आपने बिजली का किसानों पर गिरना नहीं देखा?

“नहीं देखा।''

“भंते। आप सो गए थे?

“नहीं, मैं जाग रहा था।

“ भंते! आप होश में थे ?''

“हाँ, आयुष्मान्‌! मैं होश में था।''

“तो भंते! आपने होश में जागते हुए न गरजते बादलों को सुना, न बिजली की कड़क सुनी और न उसके गिरने को देखा? ''

“हाँ, आयुष्मान्‌!

गौतम बुद्ध की ऐसी एकाग्रता देख उपस्थित लोग उनके प्रति श्रद्धावनत हो गए।

सार यह है कि लक्ष्य के प्रति एकाग्रता उसकी शीघ्र उपलब्धि का अच्छा साधन है। आज की युवा पीढ़ी एकाग्रता के जरिए अपने बड़े सपनों को जल्दी पूरा कर सकती है।

बुद्ध का वैराग्य

गौतम को घर छोड़े सात साल बीत चुके थे।

वे राजगृह में प्रवचन करते थे। उनके पिता राजा शुद्धोधन ने एक वर्ष के भीतर दस दूत उनके पास भेजे थे कि एक बार दर्शन दे दो।

वे कपिलवस्तु पहुँचे। उनके साथ उनके दोनों प्रिय शिष्य सारिपुत्र और मौदगल्याण भी थे। वहीं दोनों शिष्य, जिनकी अस्थियाँ साँची के दूसरे स्तृूप से मिली थीं।

उन्होंने कपिलवस्तु के दक्षिणी छोर से भिक्षाटन शुरू किया। संघ के सैकड़ों लोग उनके साथ थे ।

उन्हें देखने पूरा नगर उमड़ पड़ा था। अपने प्रिय राजकुमार को भीख माँगता देख लोग रो पड़े थे। राजा को पता चला, तो वे अपने बेटे को देखने सड़क पर आ गए ।

बहुत आग्रह करने के बाद शाक्यमुनि ने राजा पिता का निमंत्रण स्वीकार किया और राजभवन में गए। राजा ने संघ के अन्य भिक्षुओं को भवन के विशेष परिसर में ठहराया।

जब शुद्धोधन शाक्यमुनि का हाथ पकड़कर चल रहे थे तो अवश्य ही उनके चेहरे पर पिता होने का वह भाव आया होगा, जो पुत्र का मार्गदर्शक होने के नैसर्गिक अधिकार से भरा होता है । खुद शाक्यमुनि इस अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे।

भवन में राहुल की माता यशोधरा के पास भी तुरंत यह संदेश पहुँचा कि गौतम लौट आए हैं, वे जाएँ और अपने पति से मुलाकात करें।

लेकिन यशोधरा ने इनकार कर दिया, “गौतम उसे छोड़कर गए थे; आज लौटे हैं, तो वह क्‍यों जाए भला उनका सत्कार करने।'' यशोधरा ने संदेश भिजवाया, “यदि एक पल के लिए भी आर्यपुत्र ने मुझमें कोई गुण देखा हो, तो वे स्वयं इस कक्ष तक आएँगे, जहाँ से वे आधी रात बिना बताए चले गए थे।

तथागत राहुल माता का संदेश पाकर उनके कक्ष की ओर बढ़े । उन्होंने दोनों शिष्यों से कहा, वे कुछ भी कहें, कुछ भी करें, तुम दोनों शांत रहना। कोई प्रतिक्रिया मत करना। उन्हें सुरुचिपूर्ण वंदना करने देना।''

कमरे में तथागत अपनी शैली में बैठ गए। सारिपुत्र हमेशा की तरह उनकी दायीं और मौदगल्यायन उनकी बायीं और बैठे। यशोधरा आईं। वे राजकुमारी नहीं दिख रही थीं।

उन्होंने तथागत के चरण स्पर्श किए और उनके सामने बैठ गईं।

कमरे में शांति थी। तभी राजा शुद्धोधन कमरे में आए बेटे - बहू को आमने-सामने देख उन्होंने बेटे से कहा, “' भंते, यशोधरा ने. सुना,

आपने काषाय वस्त्र धारण किया है, तो उसने काषाय वस्त्र पहन लिये।

उसने सुना, आप एकाहारी हो गए हैं, वह भी एकाहारी हो गई। आपने उत्तम पलंग पर सोना त्याग दिया है, तो इसने भी त्याग दिया।

आपने माला का त्याग किया, गंध का त्याग किया तो इसने भी वह सब त्याग दिया। मायके वाले इसे संदेश भेजते हैं। वे इसे ले जाना चाहते हैं, लेकिन यह यहीं रहती है, इसी कक्ष में । यह गुण की मूर्ति है।

राजा स्नेह से अपनी बहू को देखते रहे। अचानक तथागत उठे। उस कक्ष से बाहर चले गए।

शाक्यमुनि ने शिष्यों को शांत रहने को कहा था, लेकिन वे स्वयं उस कक्ष से बाहर चले गए।

मैं हमेशा सोचता हूँ, उस पल क्या हुआ होगा, उनके मन के भीतर कैसे-कैसे विचार उठते होगे ?

क्या संबोधि एक लघु क्षण होता है या दीर्घ क्षण ? क्या संबोधि एक अनंत अभ्यास है ? क्‍या संयम उसका गरुड़यान है ?

धम्मपद का तेरहवाँ श्लोक बार-बार याद आता है-- यथागारं दुछेन बुट्टी समतिविबझति/एंवं अभावितं चित्तं रागो समतिविबझति।

(घर की छत मजबूत न हो, सही तरह से उसे घास-फूस से ढका न गया हो, तो बरसात के दिनों में उसमें से पानी रिसता है, घर-भर में फैल जाता है। उसी तरह ध्यान और एकाग्रता हमारे व्यक्तित्व की छत है।)

ध्यान और एकाग्रता जीवन को सार्थक करते हैं।

परमात्मा समभाव में घटी अनुभूति

एक दिन एक शिक्षित युवक बुद्ध के पास आया।

उसने बुद्ध को प्रणाम कर अपनी जिज्ञासा रखी, “गुरुजी ! आप ईश्वर की बात करते हैं ।

क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं, जो आप साधिकार इस विषय पर इतना कुछ कह पाते हैं ?

बुद्ध ने कुछ नहीं कहा और स्नेहपूर्वक उसके सिर पर हाथ फेर दिया।

युवक ने समझा कि बुद्ध के पास मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है ।

फिर उन्होंने कहा, आओ, हम कुछ देर यहाँ के बगीचे में घूमें ।” बगीचे में गुलाब और रजनीगंधा के सुगंधित फूल लगे थे।

युवक बोला, “' गुरुजी ! इन फूलों की सुगंध से सारा वातावरण महक रहा है।'' बुद्ध ने कहा, '“वत्स.! तुम ठीक कहते हो, किंतु एक बात बताओ कि यह सुगंध तुम्हें दिखाई दे रही है ?

युवक बोला, “जी, नहीं सुगंध तो अनुभव की जाती है।'” तब बुद्ध ने कहा, बस, यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है ।

तुम्हारे शरीर में जब कभी कहीं चोट लगती है, तो दर्द होता है।

क्या इस दर्द को तुम देख सकते हो? युवक बोला, “नहीं, वह भी अनुभूत ही होता है।

बुद्ध ने अंतिम रूप से युवक का समाधान करते हुए कहा, “आत्मा और परमात्मा के साथ भी यही बात है।

आत्मा को परमात्मा की अनुभूति के द्वारा उसका साक्षात्कार होता है, न कि स्थूल नेत्रों से । युवक अब पूर्णतः संतुष्ट था।

बुद्ध का आभार मानते हुए वह चला गया।

परमात्मा सदैव अनुभूति के स्तर पर ही घटता है और यह घटना तब होती है, जब मन पूर्णत: निर्लिप्त तथा समभाव को प्राप्त हो चुका हो।

महात्मा बुद्ध का उपदेश

दाता दाता चले गए, रह गए अब कंजूस।
दान मान समझे नहीं, लड़ने को तजबूत ॥

एक बार प्रदेश में अकाल पड़ा।

यह देखकर गौतम बुद्ध को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने लोगों से कहा कि बहुत से लोग अन्न और वस्त्र के लिए तरस रहे हैं ।

उनकी सहायता करना हर मनुष्य का धर्म है। आप लोगों से जो कुछ बने, वह दान करें।

बुद्ध का उपदेश सुनकर सब लोग बिना दिए अपने-अपने घर चले गए।

एक गरीब व्यक्ति बैठा ही रहा। उसने सोचा कि मेरे पास तो ये वस्त्र हैं।

अगर मैं इन्हें उतारकर दे दूँगा तो नंगा हो जाऊँगा। उसने फिर से सोचा कि मनुष्य बिना वस्त्र के पैदा होता है और बिना वस्त्र के ही चला जाता है।

न जाने कितने साधु-संन्यासी बिना वस्त्र के रहते हैं। फिर मैं बिना वस्त्र के क्यों नहीं रह सकता ?

उसने अपने वस्त्र उतारकर बुद्ध को दे दिए। भगवान्‌ बुद्ध ने उसे आशीर्वाद दिया। वह प्रसन्‍न होकर घर की ओर चल पड़ा।

वह खुशी से चिल्लाकर कह रहा था, '' मैंने अपने आधे मन को जीत लिया है।” तभी सामने से राजा की सवारी आ रही थी। उस गरीब की बात सुनकर राजा ने उसे अपने पास बुलाया और पूछा कि तुमने आधे मन को कैसे जीता है ?

उस गरीब ने कहा कि भगवान्‌ बुद्ध दु:खियों के लिए दान माँग रहे थे। यह सुनकर मैंने अपने बस्त्र उतार दिए। पहले तो मेरे मन ने इनकार किया ।

फिर मैंने उसे समझाया कि मनुष्य बिना वस्त्र के पैदा होता है और मृत्यु होने पर साथ में कुछ भी नहीं जाता। . राजा उसकी बात से बड़ा प्रसन्‍न हुआ।

उसने मोतियों का हार और कीमती वस्त्र उसे दिए। उसने वह सब ले जाकर भगवान्‌ बुद्ध के चरणों में रख दिए।

बुद्ध ने उसे हृदय से लगाते हुए कहा, ““जो दूसरों के लिए अपना सबकुछ दे देता है, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।”'

सच्चा समर्पण

एक राजा पहली बार गौतम बुद्ध के दर्शन करने अपने पास का एक अमूल्य स्वर्णाभूषण लेकर आया था।

गौतम बुद्ध उस अमूल्य भेंट को स्वीकार करेंगे, इस बारे में उसे शंका थी।

सो, अपने दूसरे हाथ में वह एक सुंदर गुलाब का फूल भी ले आया था।

उसे लगा भगवान्‌ बुद्ध इसे अस्वीकार . नहीं करेंगे। गौतम बुद्ध से मिलने पर जैसे ही उसने अपने हाथ में रखा रत्नजड़ित आभूषण आगे बढ़ाया तो मुसकराकर बुद्ध ने कहा, “इसे नीचे फेंक दो।'' राजा को बुरा लगा।

फिर भी उसने वह आभूषण फेंककर दूसरे हाथ में पकड़ा हुआ गुलाब का फूल बुद्ध को अर्पण किया, यह सोचकर कि गुलाब में कुछ आध्यात्मिकता, कुछ प्राकृतिक सौंदर्य भी शामिल है।

बुद्ध इसे अस्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन फूल देने के लिए राजा ने जैसे ही अपने हाथ आगे बढ़ाए, बुद्ध ने फिर कहा, “इसे नीचे गिरा दो।”

राजा परेशान हुआ। वह बुद्ध को कुछ देना चाहता था, पर अब उसके पास देने के लिए कुछ भी बचा नहीं था। तभी उसे स्वयं का खयाल आया।

उसने सोचा, वस्तुएँ भेंट करने से बेहतर है कि मैं अपने आपको ही भेंट कर दूँ। खयाल आते ही उसने अपने- आपको बुद्ध को भेंट करना चाहा।

बुद्ध ने फिर कहा, “नीचे गिरा दो। गौतम के जो शिष्य वहाँ मौजूद थे, वे राजा की स्थिति देखकर हँसने लगे।

तभी राजा को बोध हुआ, “मैं अपने-आपको समर्पित करता हूँ।” कहना कितना अहंकारपूर्ण है।

'मैं अपने को समर्पित करता हूँ।' यह कहने में समर्पण नहीं हो सकता, क्योंकि “मैं” तो बना हुआ है।

वह समर्पण कहाँ हुआ।'' इस बोध के साथ राजा स्वयं बुद्ध के पैरों पर गिर पड़ा।

जब बुद्ध महात्मा बन गए

गौतम सिद्धार्थ बुद्धत्व प्राप्त करके महात्मा बुद्ध बन गए।

सत्य, अहिंसा और दया की मूर्ति बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गाँव में पहुँचे।

कुछ अज्ञानी लोग उनके विरोधी थे। वे बुद्ध को अपशब्द कहने लगे। बुद्ध के शिष्यों को बहुत बुरा लगा।

मगर बुद्ध ने उन्हें समझाया, “ये लोग तो केवल अपशब्द ही कह रहे हैं, अगर ये पत्थर भी मार रहे होते तो भी मैं कहता कि मारने दो।

मैं जानता हूँ कि ये लोग कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन क्रोध के मारे वह कह नहीं पा रहे हैं।

“दस साल पहले यदि ये ही लोग मुझे गाली देते तो मैं इन्हें भी गाली देता। लेकिन अब तो लेन-देन से मुक्ति मिल चुकी है।

क्रोध से अपशब्द निकलते हैं । यहाँ तो क्रोध भवन कब का ढह चुका है।'” अपशब्द कहनेवाले बड़ी मुश्किल में पड़ गए।

तभी बुद्ध ने अपने शिष्यों से पूछा, '“इस गाँव में कुछ लोग अपशब्द कह रहे हैं। इन्हें बताओ कि वहाँ के लोग फल और मिठाइयाँ लेकर आए थे।'' बुद्ध ने पूछा, “फिर मैंने क्या किया था ?

शिष्यों ने बताया, “ आपने सारे फल और मिठाइयाँ यह कहकर वापस कर दीं कि अब लेनेवाला विदा हो चुका है।

इन्हें वापस ले जाओ। आपने कहा था कि दस साल पहले आते तो मैं सारे उपहार ले लेता ।” बुद्ध ने पूछा, “फिर उन लोगों ने मिठाइयों का क्या किया होगा ? शिष्यों ने बताया, गाँव में बाँट दी होगीं।'

बुद्ध बोले, “उन लोगों ने मिठाइयाँ गाँव में बाँट दीं। लेकिन मैं उन लोगों से कहूँगा कि अपशब्द में न बाँटें।

बुद्ध फिर बोले, “ये लोग अपशब्दों के थाल सजाकर लाए हैं । लेकिन ये गलत आदमी के पास आ गए हैं।

ये मुझसे क्रोध नहीं करवा सकते। ठीक खूँटी की तरह, जो किसी को नहीं टाँगती, लोग उस पर वस्त्र टाँग देते हैं।

बुद्ध का आत्म-नियंत्रण

एक'लड़का अत्यंत जिज्ञासु था।

जहाँ भी उसे कोई नई चीज सीखने को मिलती, वह उसे सीखने के लिए तत्पर हो जाता।

उसने एक तीर बनानेवालें से तीर बनाना सीखा, नाव बनानेवाले से नाव बनाना सीखा, मकान बनानेवाले से मकान बनाना सीखा, बाँसुरीवाले से बाँसुरी बनाना सीखा।

इस प्रकार वह अनेक कलाओं में प्रवीण हो गया। लेकिन उसमें थोड़ा अहंकार आ गया।

वह अपने परिजनों व मित्रों से कहता, “'इस पूरी दुनिया में मुझ जैसा प्रतिभा का धनी कोई नहीं होगा।' एक शहर में गौतम बुद्ध का आगमन हुआ।

उन्होंने जब उस लड़के की कला और अहंकार दोनों के विषय में सुना, तो मन में सोचा कि इस लड़के को एक ऐसी कला सिखानी चाहिए, जो अब तक की सीखी कलाओं से बड़ी हो।

वें भिक्षा का पात्र लेकर उसके पास गए।

लड़के ने पूछा, आप कौन हैं ?

बुद्ध बोले,मैं अपने शरीर को नियंत्रण में रखने वाला एक आदमी हूँ।

लड़के ने उन्हें अपनी बात स्पष्ट करने के लिए कहा। तब उन्होंने कहा,जो तीर चलाना जानता है, वह तीर चलाता है।

जो नाव चलाना जानता है, वह नाव चलाता है। जो मकान बनाना जानता है, वह मकान बनाता है, मगर जो ज्ञानी है, वह स्वयं पर शासन करता है।

लड़के ने पूछा, “वह कैसे?” बुद्ध ने उत्तर दिया, “यदि कोई उसकी प्रशंसा करता है, तो वह अभिमान से फूलकर खुश नहीं हो जाता और यदि कोई उसकी निंदा करता है, तो भी वह शांत बना रहता है, ऐसा व्यक्ति ही सदैव आनंद में रहता है।

लड़का जान गया कि सबसे बड़ी कला स्वयं को वश में रखना है।

कथा सार यह है कि आत्मनियंत्रण जब सध जाता है, तो समभाव आता है और यही समभाव अनुकूल-प्रतिकूल दोनों स्थितियों में हमें प्रसन्‍न रखता है।

मौन रहने का महत्त्व

कथा" सिद्धार्थ के जीवन के उस दौर की है,

जब वे बुद्धत्व को प्राप्त नहीं हुए थे और निरंजना नदी के तटीय वनों में वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे।

सिद्धार्थ प्रतिदिन ध्यान करने के बाद पास के किसी गाँव में चले जाते और भिक्षा माँगकर लौट आते।

कुछ दिनों बाद उन्होंने भिक्षाटन पर जाना बंद कर दिया, क्योंकि एक गाँव के प्रधान की छोटी बेटी सुजाता उनके लिए नित्य भोजन लाने लगी।

सिद्धार्थ को वह बड़े स्नेह से भोजन कराती थी।

कुछ दिनों बाद उसी गाँव का एक चरवाहा भी सिद्धार्थ से प्रभावित होकर उनके पास आने लगा।

उसका नाम स्वस्ति था।

एक दिन स्वस्ति से सिद्धार्थ बातें कर रहे थे कि सुजाता भोजन लेकर आई। जैसे ही सिद्धार्थ ने भोजन करना शुरू किया, उन्होंने बातचीत बंद कर दी।

जितनी देर तक वे भोजन करते रहे, बिल्कुल चुप रहे और वहाँ सन्नाटा छाया रहा। स्वस्ति को हैरानी हुई ।

उसने सिद्धार्थ के भोजन करने के उपरांत उनसे पूछा, गुरुदेव ! आप मेरे आने के बाद निरंतर वार्त्तालाप करते रहे, किंतु भोजन के समय एक शब्द भी नहीं बोले।

इसका क्‍या कारण है?” सिद्धार्थ बोले, “' भोजन का निर्माण बड़ी कठिनाई से होता है।

किसान पहले बीज बोता है, फिर पौधों की रखवाली करता है और तब कहीं जाकर अनाज पैदा होता है।

फिर घर की महिलाएँ उसे बड़े जतन से खाने योग्य बनाती हैं।

इतनी कठिनाई से तैयार भोजन का पूरा आनंद तभी संभव है, जब हम पूर्णत: मौन हों। अत: भोजन के दौरान मैं मौन रहकर उसका पूरा स्वाद लेता हूँ ।

वस्तुत: शांति से किया गया भोजन न केवल शारीरिक भूख को तृप्त करता है, बल्कि मानसिक आनंद और सात्विक ऊर्जा भी देता है।

सत्य की प्राप्ति में ही स्थायी सुख है

बौद्ध भिक्षु बोधीधर्म जब बौद्ध धर्म को भारत से चीन,

जापान और पूर्वी एशिया के अन्य देशों में ले गए तो बौद्ध धर्म की झेन शाखा विकसित हुई।

इसमें कथाओं के माध्यम से चेतना का विस्तार कर बद्धत्व की प्राप्ति के काबिल बनाया जाता है।

ऐसी ही एक झेन कथा है कि एक व्यक्ति घने जंगल से गुजर रहा था।

अचानक सामने एक भयानक शेर आ गया। हड़बड़ाकर वह उलटी दिशा में भागने लगा और जल्दी ही एक सैकड़ों फीट गहरी खाई के किनारे पहुँच गया।

तभी उसे खाई में एक लंबी बेल लटकती नजर आई। उसे उम्मीद जगी कि बेल पर लटककर नीचे उतरने की कोई राह निकल आएगी।

वह बेल पकड़कर लटकने लगा। तब तक खाई के कगार पर पहुँच चुका शेर उसे देखकर दहाड़ने लगा।

तभी उसकी निगाह नीचे गई तो देखा कि नीचे खाई में एक अजगर मुँह फाड़े उसका इंतजार कर रहा है।

तभी उसने देखा कि न जाने कहाँ से दो चूहे आकर बेल कुतरने लगे। एक चूहा सफेद और एक काला था।

इस संकट के बीच उसे बेल में एक लाल और रसभरा चेरी की तरह का फल दिखा।

उसने फल को मुँह में रखा और कहा कि कितना मीठा और अद्भुत फल है।

शेर भूतकाल के कर्मों का प्रतीक है, जो हमारा पीछा करते हैं। साँप बुढ़ापे व बीमारियों का प्रतीक है।

खाई में लटकती बेल वर्तमान है।

भूत व भविष्य के खतरों के बीच हम वर्तमानः में वजूद बनाए हुए हैं और जंगली फल सांसारिक अस्थायी आनंद का प्रतीक है।

दो चूहे दिन और रात का प्रतीक हैं, जो लगातार उम्ररूपी वर्तमान की बेल काट रहे हैं।

ऐसे खतरों के बीच रहकर भी मानव भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सत्य की प्राप्ति में नहीं लगता और जंगली फल जैसे अस्थायी सुखों की प्राप्ति में खुद को धन्य मानता है।

दुनिया के अंत से परमेश्वर का आरंभ

एक युवा एक फकीर के पास पहुँचा और शिष्य बनने की इच्छा व्यक्त की। फकीर ने उसे अपने पास रख लिया।

युवा ने कुछ दिन बाद पूछा, “मैं सत्य की खोज में हूँ।

वह कहाँ मिलेगा ?'' फकीर बोला, “सत्य तुम्हें वहाँ मिलेगा, जहाँ दुनिया का अंत होता है।

युवा फकीर से अनुमति लेकर दुनिया का अंत खोजने के लिए निकल गया।

वर्षो तक सफर करने के बाद वह उस गाँव तक पहुँच गया, जिसे दुनिया का अंतिम गाँव माना जाता था। उसने गाँव के लोगों से पूछा कि दुनिया का अंत कितनी दूर है ?

लोगों ने कहा, '' थोड़ा आगे जाने पर वहाँ एक पत्थर लगा है, जिस पर लिखा है-- यहाँ दुनिया समाप्त होती है, किंतु तुम वहाँ मत जाओ।

जिस भयावह गड्ढे पर दुनिया समाप्त होती है, वह तुम देख नहीं पाओगे, डर जाओगे।'' वह बोला, “मुझे उस सत्य को पाना है।

अतः मैं वहाँ जाऊँगा।'” जब युवा उस स्थान पर पहुँचा तो वहाँ भयावह शून्य था और गहरे गड्ढे की कोई तलहटी नजर ही नहीं आ रही थी।

वह इतना भयभीत हो गया कि मुँह से बोल ही नहीं निकले और फिर जो भागना शुरू किया तो सीधा फकीर के पास ही आकर रुका ।

फकीर ने उसकी दशा देखकर उससे पूछा, '“तख्ती के दूसरी ओर क्या लिखा था? '' वह बोला, “दूसरी ओर तो मैंने देखा ही नहीं, क्योंकि इस तरफ भीषण दृश्य था। मैं डर कर भागा ।

तब फकीर ने उसे समझाया कि तख्ती के दूसरी ओर लिखा था, “यहाँ परमात्मा का आरंभ होता है।' दुनिया खत्म होने से अभिप्राय उसके राग-रंग समान होने से है ।

जहाँ हम दुनिया के आकर्षणों से दूर होते हैं, वहीं परमात्मा की उपलब्धि हो जाती है, जो परम सत्य है और जिसे तुम पाना चाहते हो।

बुद्ध का ज्ञान

महात्मा गौतम बुद्ध के श्रावस्ती में प्रवचन चल रहे थे।

प्रवचन में नित्य ही बड़ी संख्या में लोग आते और विविध महत्त्वपूर्ण व गंभीर विषयों पर बुद्ध से ज्ञान ग्रहण करते ।

बुद्ध का शिष्य वर्ग भी काफी विशाल था, जो प्रवचन स्थल की व्यवस्था सँभालता और बुद्ध की सेवा में सदैव तत्पर रहता।


एक बार रात के समय महात्मा बुद्ध प्रवचन दे रहे थे।

सदैव की भाँति काफी लोग उनके प्रवचन सुन रहे थे।

एक व्यक्ति जो बुद्ध के ठीक सामने बैठा था, बार-बार नींद के झोंके ले रहा था।

बुद्ध थोड़ी देर तक तो प्रवचन देते रहे, फिर उससे बोले, '“वत्स, सो रहे हो?

उस व्यक्ति ने हड़बड़ाकर कहा, “नहीं महात्मा ।

बुद्ध ने पुन: प्रवचन प्रारंभ किए। वह व्यक्ति फिर ऊँघने लगा।

महात्मा ने फिर वही प्रश्न दोहराया और उसने फिर अचकचाकर नहीं महात्मा कहा।

ऐसा लगभग आठ-दस बार हो गया। कुछ देर बाद बुद्ध ने उससे पूछा, ““वत्स जीवित हो?

हर बार की तरह इस बार भी उसने कहा, “नहीं महात्मा।”

यह सुनकर उपस्थित श्रोताओं में हँसी की लहर दौड़ गई और वह उ्यक्ति पूर्णत: चैतन्य हो गया।

तब बुद्ध गंभीर होकर बोले, वत्स! निद्रा में तुम्हारे मुख से सही उत्तर निकल ही गया।

जो निद्रा में है, वह मृतक समान ही है।'” महात्मा बुद्ध का संकेत था कि गुरु से ज्ञान ग्रहण करते वक्‍त सजगता अत्यंत आवश्यक है।

गाफिल रहने की स्थिति में ज्ञान की प्राप्ति पूर्ण नहीं होती और अधकचरा ज्ञान सदैव खतरनाक साबित होता है।

भगवान्‌ बुद्ध ने गॉववालों को उपदेश दिया

बुद्ध ने कहा, '' भाग्य के भरोसे बैठने वालो, पुरुषार्थ करो।

जीवन में बु भाग्य का महत्त्व है, लेकिन भाग्य के भरोसे बैठकर अपने अमूल्य समय को बरबाद मत करो, क्योंकि पुरुषार्थ करने से तो भाग्य की रेखाएँ बदल जाती हैं।

भाग्य क्या है ? आज किया गया कर्म ही तुम्हारा भाग्य बनता है।

कर्म के द्वारा जो बीज बोओगे, फसल भी उसी की मिलेगी। जैसा कर्म तुम आज करोगे, वैसा ही तुम्हारा भविष्य होगा। सौभाग्य और दुर्भाग्य तुम्हारे ही हाथ में है। कर्म की प्रधानता को समझना होगा कि जैसा कर्म होगा, वैसा ही फल मिलेगा।

जीवन को सफल बनाने के लिए पाप और पुण्य का बड़ा महत्त्व है। पूरी सावधानी रखो कि पाप होने न पाए, क्योंकि पाप की सजा जरूर मिलती है। यह जीवन पिछले पापों से छुटकारा पाने के लिए और दूसरे नए पापों से बचने के लिए मिला है और कोशिश करो हमसे पुण्य कर्म हों। तुम अपने जीवन को धर्म के मार्ग पर चलाओ। तुम्हारे किए हुए पुण्यों से धर्म को शक्ति मिलती है।

यह मानव का जीवन बड़े काम का है। इसे सावधानी पूर्वक जीना चाहिए। अगर तुम गलतियाँ करोगे तो आगे चलकर पशु-पक्षियों वाले कपड़े पहनने पड़ेंगे। संसार के नश्वर-पदार्थों की इच्छा मत करना, क्योंकि

इच्छा का फल बहुत दुःख देता है।

अच्छे-अच्छे कर्म करो। उन कर्मों को करके अहंकार मत करना। अहंकार के मार्ग में अँधेरा होता है और अँधेरे में ठोकरें लगती हैं। संसार दुःखालय है अर्थात्‌ दु:खों से भरा हुआ है। संसार से प्रेम मत करना, बल्कि अपने मन से पापों को बाहर निकालो और सदा सावधान रहो कि कोई पाप न होने पाए।

मनुष्य का जीवन मिला है तो इसको सावधानीपूर्वक व्यतीत करना। अपने जीवन में आलस्य को आने मत देना, क्योंकि यह जीवन बहुत अनमोल है। पशुओं से पूछो कि मनुष्य जीवन का क्या महत्त्व है? पशुओं के जीवन में तो लेश-मात्र भी सुख नहीं है। वे सोचते हैं कि हम कब मनुष्य बनेंगे? सरदी में रजाई और गरमी में पंखा होगा। कब हम परोपकार करके अपना जीवन सफल बनाएँगे।

जो मनुष्य हैं, वे अपनी मानवता को सँभालकर रख नहीं पा रहे हैं, बल्कि संसार के सुखों की अँधी-दौड़ में दौड़ रहे हैं। वे नहीं जान पा रहे हैं कि हमारी मृत्यु हमारे पीछे-पीछे आ रही है।

मानव-जीवन पाया है, बहुत अच्छी बात है। अच्छे-अच्छे कर्म करो ताकि मन पवित्र हो जाए, क्‍योंकि पवित्र-मन ही आत्मा को पा सकता है। अपने मन को शरीर में ही फँसाकर मत रखो, क्योंकि शरीर आज है, कल रहेगा या नहीं, यह किसी को भी मालूम नहीं है।

शरीर आज नहीं तो कल मिटेगा, किंतु आत्मा सदा अमर है। शरीर को आयु कुछ वर्षो की है, परंतु आत्मा अनंत है। वह तीनों कालों में है। आत्मा पहलें भी था, अब भी है और बाद में भी रहेगा। वह शाश्वत है, सनातन है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। संसार की सारी शक्तियाँ उसी से सत्ता पाती हैं।

तुम मनुष्य बने हो । विचार करो कि तुम कौन हो? जब तक यह समझ में नहीं आएगा कि तुम कौन हो? तब तक तुम भटकते रहोगे। जब तक तुम

अपनी भूल में सुधार नहीं करोगे, तब तक तुम शांति को प्राप्त नहीं कर सकते । शांति को पाना है तो मन को पवित्र करके आत्मा का अनुभव कर लो।

आत्मा में ही अनंत-विश्राम है। यह शरीर कुछ समय के लिए मिला है। वास्तव में तुम आत्मा हो। तुम्हारा शरीर जिससे शक्ति पा रहा है, वह आत्मा ही है और वही आत्मा तुम्हारे शरीर में मौजूद है। आत्मा को जानना, आत्मा को समझना, आत्मा को पाना, आत्मा का अनुभव करना और आत्मा का साक्षात्कार करना यह सब मनुष्य शरीर के द्वारा ही संभव है । बस तुम सावधान हो जाओ कि मन में कोई गलत-विचार आने न पाए। पहले मन में गलत-विचार आता है, फिर वह विचार बलवान होने पर गलत कर्म करवा देता है। गलत कर्म का मतलब है, पाप का जन्म हो जाना बुद्ध ने कहा कि तुम्हारे जीवन के साथ-साथ काल भी दौड़ रहा है। बचपन और यौवन कब निकल जाएँगे, पता भी नहीं चलेगा। शरीर भी अनेक रोगों से घिरा रहता है। इस शरीर की शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के रोगों से रक्षा करनी पड़ती है। रोग और भोग दोनों शरीर को निर्बल करते रहते हैं ।

रोगी और भोगी दोनों को ज्ञान अच्छा नहीं लगता। जिनका तन और मन स्वस्थ नहीं होता, वे परमार्थ का लाभ नहीं उठा पाते। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आयु रूपी संपदा -का पूरा-पूरा लाभ उठाए। अगर मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में अच्छे-अच्छे कर्म करके श्रेष्ठ प्रगति कर सकता है।

जीवन में संयम को धारण करें। व्यर्थ की कामनाओं का त्याग करें। ज्ञान का दीपक जलाकर कामनाओं का विसर्जन करें। क्रोध को आग समझकर उससे सदा दूर रहना चाहिए। सदा ज्ञान-गंगा का संग करो, क्योंकि शुभ- विचार ही समस्त समस्याओं का समाधान है।

बुद्ध ने कहा कि अपने जीवन से सदा लोभ को दूर रखो, क्योंकि तुम्हारे बूढ़े होने पर भी लोभ बूढ़ा नहीं हो पाता और लोभ सदा भूखा ही रहता है, उसका पेट कभी भी नहीं भर पाता। अगर लोभ की वासना प्रबल

है तो वह दूसरे जन्म में भी पीछा नहीं छोड़ती ।

जिस मनुष्य को लोभ अपने वश में कर लेता है। उसका ज्ञान वह चुरा लेता है। लोभ को शांत करना है तो संतोष की शरण में जाना होगा।

मोह के आकर्षण में मत आना, क्योंकि मोह से तुम्हारा मन बँध जाएगा और बँधा हुआ मन तुमको बहुत दुःख देगा। मन के दु:ख का कारण है 'अज्ञान'। मन में अगर अज्ञान है तो दु:खों से कभी भी छुटकारा नहीं हो सकेगा। बस एक सम्यक्‌ ज्ञान ही है, जो तुमको परम-शांति और मोक्ष दे सकता है।

तुम अपने तन और मन में प्रेम तथा ज्ञान की ज्योति जला लो फिर तुम्हारे जन्म-जमांतर का अज्ञान मिट जाएगा। आज तुम मनुष्य-जन्म को धारण करके बैठे हो, इसका मतलब यह है कि तुम शांति और मोक्ष के अति निकट हो। अब तुम संसार में रहकर भी संसार के लगाव में फँसना मत। संसार के अज्ञान से दूर रहना, क्योंकि वह तुमको बाँध देगा। अपनी आत्मा का ध्यान करो, वह तुमको सर्व बँधनों से मुक्त कर देगा।