मन के साधे-साधना है, सम्पदा है। मन न सधे तो मैं बाधा है, विपदा है। अद्भुत है मनुष्य का मन। यही रहस्य है-सांसारिक सफलताओं का और आध्यात्मिक विभूतियों का। पाप-पुण्य, बन्धन-मोक्ष, स्वर्ग-नरक सभी कुछ इसी में समाये हैं। अंधेरा और उजाला सब इसी में हैं। इसी में जन्म और मृत्यु के कारण हैं। यही है द्वार बाहरी दुनिया का, यही है सीढ़ी अन्तस् की। इसको साधने की साधना बन पड़े तो मनुष्य सबसे पार हो जाता है।

जिनकी जिन्दगी में साधना का सच है, उनकी अनुभूति यही कहती है कि मन सब कुछ है। सब उसकी ही लीला और कल्पना है। यह खो जाय तो सारी लीला विलीन हो जाती है। एक बार महाकाश्यप ने तथागत से पूछा था-भगवन् मन तो बड़ा चंचल है, यह सधे कैसे? खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, यह निर्मल कैसे हो? इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् चुप रहे। हाँ अगले दिन वह महाकाश्यप के साथ एक यात्रा के लिए निकले। 

इस यात्रा में दोपहर के समय वह एक वृक्ष की छाँव में विश्राम के लिए रुके। उन्हें प्यास लगी तो महाकाश्यप पास के पहाड़ी झरने से पानी लेने के लिए गये। लेकिन झरने में से अभी बैलगाड़ियाँ निकली थीं और उसका सब पानी गंदा हो गया था। महाकाश्यप ने सारी बात भगवान् को बताते हुए कहा-प्रभु! झरने का पानी गंदा है, मैं पीछे जाकर नदी से पानी ले आता हूँ। लेकिन बुद्ध ने हँसते हुए कहा-नदी दूर है, तुम फिर से वापस झरने के मूल में जाओ और पानी लेकर आओ। भगवान् के कहने से महाकाश्यप फिर से वापस लौटे-उन्होंने देखा अपने मूल स्रोत में झरने का पानी बिल्कुल साफ है, वे जल लेकर वापस आ गये।

उनके लाये जल को पीते हुए भगवान् ने उन्हें बोध दिया- महाकाश्यप मन की दशा भी कुछ इसी तरह से है। जिन्दगी की गाड़ियाँ इसे विक्षुब्ध करती रहती हैं। यदि कोई शान्ति और धीरज से उसे देखता रहे, उसके मूल स्रोत में प्रवेश करने की कोशिश करे तो सहज ही निर्मलता उभर आती है। बस बात मन को साधने की है। मन को साधने की साधना करते हुए ही जीवन निर्मलता, सफलता एवं आध्यात्मिक विभूतियों का भण्डार बन जाता है।