राजा जनक के मंत्रियों द्वार, राम-लक्ष्मण का समाचार पाकर राजा दशरथ बड़े आनंदित हुए ।

धनुर्भभ की बात सुनकर तो उनके आनंद का ठिकाना न रहा । महल में जाकर उन्होंने सब समाचार रानियों को सुनाए। रानियाँ भी फूली न समाईं । उन्होंने ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी ।

गुरु वशिष्ठ की आज्ञा लेकर राजा दशरथ बारात की तैयार कराने लगे | हाथी, घोड़े और रथ सभी सजने लगे । छैल-छबीले सवार घोड़े नाचने लगे । गुरु वशिष्ठ और राजा दशरथ दिव्य रथों में बैठे | चतुरंगिणी सेना के साथ बारात चल पड़ी और पाँचवें दिन मिथिला जा पहुँची ।

राजा जनक नें नगर के बाहर आकर बारात का स्वागत किया और भली-भाँति सजाए गए जनवासे में सबको ले जाकर यथायोग्य ठहराया ।


विश्वामित्र को जब राजा दशरथ के आने का समाचार मिला तब दोनों राजकुमारों को लेकर वे जनवासे पहुँचे । राम-लक्ष्मण ने पिता के चरणों में प्रणाम किया । राजा दशरथ ने विश्वामित्र के चरण छुए और कहा-..““मुनिवर ! आपकी कृपा से ही शुभ दिन मुझे देखने को मिला है ।

राजा जनक की सारी नगरी जगमग-जगमग कर रही थी। एक-एक घर, एक-एक द्वार वंदनवारों से सजा था ।

चारों ओर मंगल गीत सुनाई दे रहे थे । राजमार्ग और राजमहल में दर्शकों की अपार भीड़ थी ।

विवाह-मंडप मणियों और हीरों के फूल-पत्तों से सजा था । मणियों के . बने भौरे और तरह-तरह के पक्षी विवाह-मंडपर पर जड़े थे, जो हवा चलने से गूँजते-कूजते थे।

चारों राजकुमारों को लेकर गुरु वशिष्ठ के साथ महाराज दशरथ विवाह-मंडप में पधारे ।

बहुमूल्य वस्त्रों और आशभूषणों से सुसज्जित चारों राजकुमारियों को लेकर राजा जनक भी मंडप में आए ।

राजमहल की अनेक स्त्रियाँ भी सजकर विवाह देखने पहुँचीं। राजा जनक सीता को दिखाकर महाराज दशरथ से बोले -““राजन्‌ ! यह मेरी बड़ी बेटी सीता है जो मुझे हल चलाते समय पृथ्वी से मिली थी।

आपके वीर पुत्र श्रीराम ने मेरा प्रण पूरा कर इसे वरण करने का अधिकार प्राप्त किया है | यह मेरी दूसरी पुत्री उर्घिला है और ये दोनों कन्याएँ मेरे छोटे भाई कुशध्वज की हैं ।

बड़ी का नाम मांडवी है और छोटी का श्रुतकीर्ति । मेरी इच्छा है कि सीता के विवाह के साथ इनका भी विवाह हो जाए । लक्ष्यण के लिए उर्मिला को, भरत के लिए मांडबी को और शत्रुघ्न नए को स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करें ।'”

जनक के प्रस्ताव को राजा दशरथ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया, तब अग्नि के सामने चारों कन्याओं को अपने-अपने पतियों के हाथ में सौंपते हुए राजा जनक ने कहा कि इन कन्याओं को मैं तुम्हारे हाथ सौंपता हूँ ।

ये छाया की भाँति तुम्हारे साथ रहेंगी ।

तुम इनका पाणिग्रहण करो, इनकी सब तरह से रक्षा करना तुम्हारा धर्म होगा । गुरु वशिष्ठ और शतानन्द ने बेद-मंत्रों के साथ विधिवत्‌ विवाह कराया |

तब राजा दशरथ राजकुमारों और पुत्र-वधुओं को लेकर जनवासे लौट आए । जनक ने कन्याओं और सब बरातियों को सुंदर उपहार दिए । राजा दशरथ ने भी सोने से सींग मढ़ाकर दूध

देने वाली सहसरों गायें ब्राह्मणों को दान में दीं। दूसरे दिन विश्वामित्र ने आकर राजा दशरथ को बधाई दी और सबसे विदा लेकर वे अपने आश्रम को लौट गए ।

कुछ दिन तक जनक का आतिथ्य ग्रहण करने के पश्चात राजा दशरथ ब्रैट के साथ अपने नगर को लौट चले।

वे कुछ ही दूर गए होंगे कि सहसा भयंकर आंधी-सी आई और उसके साथ ही क्रोध की साक्षात मूर्ति परशुराम फरसा और धनुष बाण लिए प्रकट हो गए उन्हें देखते ही अयोध्यावासी डर के मारे अधमरे-से हो गए और राजा दशरथ के तो होश ही उड़ गए।

राम का रास्ता रोककर परशुराम बोले, राम!

शिव के पुराने धनुष को तोड़कर तुम्हारा होसला बहुत बढ़ गया है। मैं तुम्हारे अहंकार को चूर करूँगा ।'”

राजा दशरथ ने गिड़गिड़ाकर परशुराम से बड़ी अनुनय-बिनय की और राम पर अनुग्रह करने की प्रार्थना की ।

परशुराम ने दशरथ की बात सुनी-अनसुनी कर दी और राम से फिर बोले, “मेरे इस धनुष को चढ़ाओ, यदि न चढ़ा सके तो तुम तत्काल मेरे फरसे का आहार बनोगे।”!

यह सुनते ही राजा दशरथ तो बेसुध होकर गिर पड़े, मनस्वी राम निर्भीकता से बोले, “मेरा रूप आप देखना चाहते हैं तो देखें ।”

उन्होंने परशुराम के धनुष बाण लेकर प्रत्यंचा चढ़ा दी ओर धनुष पर बाण रखकर बोले , “मैं इस बाण से आपकी तपस्या का समस्त प्रभाव अभी नष्ट करता हूं और भनार्गात से आकाश में बिचरण करने की शक्ति भी नष्ट करता हूँ।”

परशुराम हतप्रभ हो गए ।

उन्होंने राम की स्तुति की और आशीर्वाद दिए और यह प्रार्थना की कि तप का फल भले ही नष्ट कर दें, परंतु मनोगति नष्ट न करें जिससे मैं महेन्द्र पर्वत पर लौट सकूँ ।

श्रीराम ने उनकी बात मान ली ।

परशुराम राम की प्रशंसा करते हुए तत्काल चले गए।

परशुराम के चले जाने के बाद बारात आगे बढ़ी ।

बारात के पहुँचते ही अयोध्या में घर-घर आनंदोत्सब होने लगे ।

गलियों में शंख और मृदंग की ध्वनि गूँज उठी। स्त्रियों ने मंगल-गान किए और फूल बरसाए। रानियों ने पुत्रों और पुत्र-वधुओं की आरती उतारी ।

उस समय राजा दशरथ के भवन की शोभा देखते ही बनती थी

राजकुमार शील-गुण-संपन्‍न पत्नियाँ पाकर बड़े प्रसन्‍न थे ।

सीताजी के अनुपम रूप, गुण और सेवा से श्रीराम और सास-ससुर सब प्रकार से संतुष्ट थे ।

राजकुल में दिन-दिन सुख-समृद्धि की वृद्धि होने लगी । समस्त कौशल राज्य का भाग्य जग गया।