विवाह में वर के प्रति कन्या के अर्पण की प्रक्रिया को अगर व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो यह समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलाने की एक पद्धति है। किन्तु इसे अगर आध्यात्मिक अर्थ में देखें, तो विवाह केवल एक सामाजिक व्यवस्था मात्र नहीं, यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है। 

      विवाह का उद्देश्य केवल परिवार तक ही सीमित नहीं, बल्कि उससे भी ऊपर है। विवाह में कन्यादान के पूर्व एक प्रक्रिया है। वर जब मण्डप में आता है, तब कन्या का पिता पहले वर के चरण धोता है और तब उसे अपनी कन्या अर्पित करता है।

        यह जो चरण धोने की प्रक्रिया है, इसका मूल उद्देश्य क्या है ? पिता को अपनी पुत्री के प्रति बड़ी ममता होती है और जब वह वर के प्रति कन्या अर्पित करता है, तब आध्यात्मिक दृष्टि से वह अपनी ममता का अर्पण करता है, ममता का त्याग करता है। अतः कहीं उसे अपने इस त्याग का, इस अर्पण का अभिमान न हो जाय कि मैं बड़ा वैराग्यवान हूँ या बड़ा दानी हूँ, इसीलिए इसकी व्यवस्था की गयी है, क्योंकि ऐसी समस्या भी आती है।

जिन लोगों के जीवन में त्याग नहीं होता, वे तो आसक्ति से बँधे होते हैं, पर जिनके जीवन में ममता का त्याग है, उनके जीवन में भी एक समस्या है। क्या ? 

     जिस व्यक्ति के जीवन में ममता का जितना ही त्याग होता है, उसके जीवन में अहंता की उसी परिमाण में वृद्धि हो जाती है।

        इसीलिए विवाह में कन्यादान के साथ वर के पद-प्रक्षालन की क्रिया जुड़ी हुई है। कन्या का अर्पण जहाँ ममता के त्याग का द्योतक है, वहीं पद-प्रक्षालन अहंता के परित्याग का परिचायक है। यों तो व्यावहारिक रूप से देखें तो देनेवाला बड़ा और लेनेवाला छोटा होना चाहिए। और इस तरह से लगता तो यही है कि ग्रहीता ही कन्यादान करनेवाले का पद-प्रक्षालन करे, क्योंकि वह अपनी कन्या देकर उसके प्रति विशेष स्नेह तथा उदारता का परिचय दे रहा है। पर कन्या के पिता के मन में यह वृत्ति है - नहीं, यह जो मैं अर्पण कर रहा हूँ, यह व्यक्ति के प्रति नहीं, अपितु साक्षात् नारायण के प्रति कर रहा हूँ। इसीलिए तो विवाह के मन्त्र में वर को व्यक्ति के रूप में न देखकर 'विष्णुरूपये' कहकर कन्यादान दिया जाता है कि आप साक्षात् विष्णु रूप हैं और मैं कन्यारूपी लक्ष्मी, जो आपकी ही वस्तु है, आपको अर्पित कर रहा हूँ। इसीलिये कन्यादान के पूर्व वर के पद-प्रक्षालन की प्रथा है, ताकि कहीं देनेवाले के मन में अहंता न आ जाय। यही ज्ञान की प्रक्रिया है।

      जहाँ ज्ञान है, वहाँ अहंता और ममता का अभाव होना चाहिए। कौशल्याजी ज्ञानमयी हैं, इसलिये उनके विवाह में इसी क्रम का निर्वाह हुआ। वहाँ इसी प्रक्रिया की प्रधानता है। और यही अहंता और ममता का अभाव कौशल्याजी के जीवन में आदि से अन्त तक दिखाई देता है। विवाह के समय कौशल्याजी के पिता ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उन्हें महाराज दशरथ को अर्पित किया। 👏