लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व की बात है, बुन्देलखण्ड के ओड़छा राज्य पर राजा मधुकरशाह का शासन था। 

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वे बड़े ही भक्तिभाव सम्पन्न और साधु-सेवी थे। उनके राजपुरोहित थे-पण्डित सुखोमनि शर्मा। वे विद्वान तो थे ही, भगवद्भक्त और साधु-सेवी भी थे। 

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मार्गशीर्ष कृष्णा पंचमी सम्वत् 1567 को इनके घर एक बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम हरिराम रखा गया। 

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हरिराम प्रारम्भ से ही बड़े मेधावी और प्रतिभाशाली थे। युवा होते होते वे प्रसिद्ध विद्वानों में गिने जाने लगे। 

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पिता ने एक अच्छा घराना देखकर उनका विवाह भी कर दिया। कुछ दिन उपरांत जब उनके पिता शरीर त्याग गये तो ओड़छा नरेश मधुकरशाह ने उन्हें अपना राजपुरोहित नियुक्त कर दिया।

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पण्डित हरिराम जी विद्वान थे, वेदों-शास्त्रों के ज्ञाता थे, अतएव अनेक लोग उनसे शास्त्रों का मर्म समझने आने लगे। 

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इससे उन्हें विद्या का अहंकार हो गया। वाद-विवाद करके अन्य विद्वानों तथा पण्डितों को पराजित करना-यह उनकी एक आदत हो गई। 

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जहाँ कहीं किसी विद्वान का नाम सुनते, उससे शास्त्रार्थ करने के लिए वहीं पहुँच जाते और उन्हें हराकर खूब हर्षित होते। 

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उनकी अवस्था कुछ इस प्रकार की थीः-

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संस्कृतहिं  पंडित कहे, बहुत करै अभिमान।

भाषा  जानि तरक करै, ते नर मूढ़ अजान।।

पंडित  और  मसालची , दोनों  सूझै नाहिं।

औरन  को  करैं चाँदनी, आप अंधेरे माहिं।।

पढ़ पढ़ के  पंडित भये , कीरति भई संसार।

वस्तु की तो समुझ नहीं, ज्यूं खर चंदन भार।।

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एक बार शास्त्रार्थ के लिए वे काशी गये, वहां के जाने-माने विद्वानों से शास्त्रार्थ किया और उन्हें अपनी विद्वता से पराजित किया। 

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काशी के प्रकाण्ड पण्डितों को हराकर वे मन में अति हर्षित हुए और अपनी विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने विश्वनाथ जी के मन्दिर में जाकर विश्वनाथ जी का अभिषेक किया। 

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उसी सायं जब वे गंगा के तट पर बैठे थे, एक साधु उनके पास आया और उन्हें सम्बोधित कर बोला-पण्डित जी! मेरे एक प्रश्न का उत्तर देंगे?

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पण्डित जी बोले- पूछिये।

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साधु ने कहा- विद्या की पूर्णता कब है?

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पण्डित हरिराम जी ने उत्तर दिया, सत्य-असत्य को जानकर प्राप्त करने योग्य पदार्थ को प्राप्त करने में ही विद्या की पूर्णता है।

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साधु ने कहा- पण्डित जी! आप दूसरों को जितना समझाते हैं, उतना स्वयं को क्यों नहीं समझाते? 

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विद्या की पूर्णता जब प्राप्त करने योग्य पदार्थ को प्राप्त करने में है, तब फिर वाद-विवाद करने से क्या लाभ? 

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क्या वाद-विवाद में दूसरों को पराजित करके उस पदार्थ की आपको प्राप्ति हो जाएगी? कदापि नहीं। 

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वह पदार्थ तो भक्ति से ही प्राप्त होता और हो सकता है। इसलिए भगवान की भक्ति में ही विद्या की पराकाष्ठा अथवा पूर्णता है। 

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अपनी विद्या को पूर्ण करने के लिए आपको भक्ति करनी चाहिए। अपूर्ण और अधूरी विद्या होने पर भी अपने को विद्वान और पण्डित समझना तथा दूसरों को पराजित कर प्रसन्न होना आपको कदापि शोभा नहीं देता।

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साधू तो यह कहकर अपने रस्ते गया, परन्तु उसके वचनों ने पण्डित हरिराम जी को झकझोर कर रख दिया। 

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विद्या का सब नशा उतर गया। काशी में सब विद्वानों को हराकर भी अब वे स्वयं को हारा हुआ मान रहे थे। 

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साधु के वचनों ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। वे काशी से तुरन्त ओड़छा लौट गए। 

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उन्हें धन-दौलत, मान-प्रतिष्ठा, पद-अधिकार आदि सब व्यर्थ और थोथे मालूम होने लगे। 

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अब तो बस उनके मन में एक ही आकाँक्षा रह गई कि किसी उच्चकोटि के सन्त महापुरुष का पता चल जाए तो उनकी शरण ग्रहणकर जीवन सार्थक कर लिया जाए, 

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क्योंकि यह बात वे भलीभाँति जानते थे कि बिना पूर्ण गुरु की शरण ग्रहण किये मनुष्य का निस्तार नहीं होता।

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।।सोरठा।।

बिन सतगुरु उपदेस, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे।

ब्राहृा बिस्नु महेस, और सकल जिव को गनै।।

खोजो सतगुरु सन्त, जीव काज जो चाहहू।

मेटौ भव को अंक, आवागमन निवारहू।।

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।।दोहा।।

केतिक पढ़ि गुनि पचि मुवा, जोग जज्ञ तप लाय।

बिन सतगुरु पावे नहीं, कोटिन करै उपाय।।

सतगुरु सरन न आवहीं, फिर फिर होय अकाज।

जीव खोय सब जाहिंगे, काल तिहूं पुर राज।।

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पूर्ण गुरु से मिलाप की उनकी यह आकांक्षा तीव्र से तीव्रतर होती गई। उन्हें न रात को नींद आती, न दिन को चैन। वे हर समय व्याकुल रहने लगे। 

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पण्डित हरिराम जी के ह्मदय की व्याकुलता की आवाज़ भी अन्ततः उनके अभीष्ट तक जा पहुँची। 

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उस समय वृन्दावन भक्ति-परमार्थ का केन्द्र था। स्वामी हितहरिवंश जी, जो कि एक उच्चकोटि के सन्त थे, उस समय वृन्दावन में निवास करते थे। 

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उन्होंने अपने शिष्य श्री नवलदास जी को ओड़छा भेजा। ओड़छा आकर श्री नवलदास जी सत्संग की गंगा बहाने लगे। 

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पण्डित हरिराम जी उनका सत्संग श्रवण कर बड़े प्रभावित हुए। 

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वार्तालाप करने पर जब उन्हें पता चला कि श्री नवलदास जी स्वामी हितहरिवंश जी के शिष्य हैं, जो कि एक उच्चकोटि के सन्त हैं, तो वे उसी दिन घर बार त्यागकर वृन्दावन चले गए। 

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उस समय उनकी आयु मात्र चौबीस वर्ष की थी।

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वृन्दावन पहुँचकर उन्होंने यमुना में स्नान किया और फिर स्वामी हितहरिवंश जी के आश्रम का पता पूछते-पूछते उनके चरणों में जा पहुंचे। 

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श्री हितहरिवंश जी के यद्यपि अनेक शिष्य थे, परन्तु उनका यह नियम था कि भगवान के भोग के लिए वे रसोई स्वयं बनाते थे। 

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उस समय भी वे भगवान के भोग के लिए रसोई बना रहे थे। पण्डित हरिराम जी ने उनसे उसी समय बाते करनी चाहीं। 

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श्री हितहरिवंश जी ने कहा- इस समय हम भगवान के भोग के लिए रसोई तैयार कर रहे हैं, थोड़ी देर बाद आइएगा।

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किन्तु हरिराम जी तो अति व्याकुल थे। उन्होंने उसी समय वार्तालाप करना चाहा। 

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यह देखकर श्री हितहरिवंश जी ने चूल्हे पर से पात्र उतार दिया। 

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हरिराम जी ने कहा-आप रसोई तैयार करिए, साथ-साथ चर्चा भी होती रहेगी। 

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श्री हितहरिवंश जी ने हरिराम जी को सही दिशा दिखाने के लिए कहा- एक ही समय में मन को दो स्थानों पर लगाये रखना असम्भव है। 

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इसलिए एक समय में इसे एक ही ओर लगाना चाहिए, तभी कार्य सिद्ध होता है। 

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वैसे भी यह मन काल-व्याल से ग्रसित है, अतः काल-व्याल से छुटकारा प्राप्त करने के लिए इसे सब ओर से समेट कर भगवान के चरणों में लगाने से ही जीवन सफल होता है और ऐसा करने वाला ही धन्य है।

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पण्डित हरिराम जी उनके चरणों में गिर पड़े और शरण में लेने के लिए प्रार्थना करने लगे। 

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श्री हितहरिवंश जी ने उन्हें नाम-उपदेश देकर उनका नाम "व्यासदास' रख दिया। 

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तदुपरान्त श्री व्यासदास जी वृन्दावन में ही रहने लगे और अहनिशि भगवान की भक्ति में संलग्न रहने लगे।

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कुछ दिनों के उपरान्त ओड़छा के कुछ प्रेमी भक्त वृन्दावन गए। वहाँ उन्होंने श्री हितहरिवंश जी के आश्रम पर श्री व्यासदास जी को देखा और वापस जाकर यह समाचार उनके घर वालों को तथा ओड़छा नरेश को दिया। 

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राजा मधुकरशाह ने श्री व्यासदास जी को घर वापस लिवा लाने के लिए तत्काल अपने मत्री को वृन्दावन भेजा। 

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मंत्री ने वहाँ जाकर श्री व्यासदास जी को वापस लौट चलने के लिए बहुत आग्रह और अनुरोध किया, परन्तु उन्होंने किसी तरह भी घर वापस जाना स्वीकार नहीं किया। 

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मंत्री ने जब देखा कि वे किसी प्रकार भी नहीं मान रहे, तो फिर उन्होंने दूसरी युक्ति से काम लेने की सोची। 

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मंत्री ने श्री व्यासदास जी से कहा कि यदि आप ऐसे नहीं मानेगे तो फिर मैं आपके गुरुदेव से प्रार्थना करके आपको यहाँ से ले जाऊँगा, इसलिए आप मेरा कहना मानकर केवल एक बार ओड़छा चले चलिये।

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मन्त्री की यह बात सुनकर श्री व्यासदास जी अति व्याकुल हुए। वे सोचने लगे कि यदि गुरुदेव आज्ञा करेंगे तो फिर मुझे ओड़छा जाना ही पड़ेगा, इसलिए कोई ऐसी युक्ति करनी चाहिए जिससे मुझे गुरुदेव के चरणों से दूर न होना पड़े। 

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उस दिन दोपहर को आश्रम में भगवान का भोग लग जाने पर सब साधुओं और भक्तों की पंगत बैठी, तो श्री व्यासदास जी "प्रसाद' बांटने की सेवा करने लगे। 

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जब सब साधू और भक्त प्रसाद पाकर उठ गए तब वे उनकी पत्तलों में से उठाकर जूठन खाने लगे। 

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यह देखकर मंत्री को बड़ी घृणा हुई। उसने सोचा कि अब ये आचार से गिर गये हैं और दूसरों का जूठा खाने लगे हैं, 

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अतः राजपुरोहित होने के योग्य तो ये रहे नहीं, फिर इन्हें ओड़छा ले जाने के लिए इतना आग्रह करने की क्या आवश्यकता है? यह सोचकर मंत्री वापस ओड़छा चला गया।

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वहाँ पहुँचकर मंत्री ने राजा मधुकरशाह को सारी घटना की जानकारी देते हुए कहा...

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पण्डित जी अब सबका जूठा खाने लगे हैं। अब वे यहाँ ले आने योग्य और राजपुरोहित के पद पर बने रहने के योग्य नहीं हैं। 

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किन्तु जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि राजा मधुकर शाह बड़े ही भगवद्भक्त और साधु-सेवी थे, अतः मंत्री की बातें सुनकर उन पर दूसरा ही प्रभाव पड़ा। 

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वे समझ गये कि श्री व्यासदास जी ने साधु-सन्तों का सीथ प्रसाद ग्रहण किया होगा, जिसे यह मंत्री जूठन समझ रहा है। इससे राजा की श्रद्धा श्री व्यासदास जी पर और अधिक हो गई। 

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राजा सोचने लगा कि ओड़छा राज्य धन्य हो गया, जहाँ ऐसे भक्त ने जन्म लिया। एक बार यदि वे यहाँ आ जायें तो यह मेरा अति सौभाग्य होगा।

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धन्य मात पितु धन्य हैं, धन्य सुह्मद अनुरक्त।

धन्य ग्राम वह जानिये, जहँ जन्मे गुरु-भक्त।।

(गुरु-महिमा)

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राजा मधुकरशाह श्री व्यासदास जी को लिवा लाने के लिए स्वयं वृन्दावन जा पहुँचे और उनसे ओड़छा चलने के लिए आग्रह करने लगे। 

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उन्होंने कहा-चाहे एक दिन के लिए ही सही, परन्तु आप मेरा अनुरोध मानकर ओड़छा अवश्य चलें। 

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श्री व्यासदास जी उन्हें टालने लगे। कभी कहते कि अमुक मन्दिर में जाकर भगवान के दर्शन कर आइये, कभी कहते अमुक स्थान तो देख आइये, वहाँ भगवान ने अनुपम लीलाएँ की थीं, 

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कभी कहते कि आज अमुक मन्दिर में उत्सव मनाया जा रहा है, उत्सव का आनन्द लीजिए और कभी किसी अन्य स्थान की महिमा कर राजा को वहाँ जाने के लिए कहते। 

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इसी प्रकार कई दिन बीत गए। श्री व्यासदास जी का विचार था कि इस तरह टालने पर राजा स्वयं ही तंग आकर यहाँ से चले जायेंगे, परन्तु ऐसा हुआ नहीं। 

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राजा उनकी बात मानकर उस मन्दिर अथवा स्थान पर हो आते और वापस लौटकर फिर अपना आग्रह दोहराने लगते। 

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जब कई दिन बीत गए और श्री व्यासदास जी राज़ी न हुए तो राजा ने अपने अंगरक्षकों से कहा- इन्हें बलपूर्वक पालकी में बिठा कर ले चलो।

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जब अंगरक्षक बलपूर्वक उन्हें पालकी में बिठाने लगे तो श्री व्यासदास जी ने कहा-ठीक है। जब चलना ही है तो मुझे कम से कम अपने भाई-बन्धुओं से तो मिल लेने दो। 

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राजा ने सोचा कि वे अपने गुरु-भाइयों से मिलना चाहते होंगे, अतः उसने अंगरक्षकों से कहा-इन्हें सबसे मिल लेने दो। 

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अंगरक्षकों ने उन्हें छोड़ दिया। फिर क्या था! श्री व्यासदास जी एक वृक्ष के पास गए और लगे उससे भुजा फैलाकर मिलने और फूट-फूटकर रोने। 

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राजा के अंगरक्षकों ने उस वृक्ष से हटाया तो दूसरे से रो-रोकर मिलने लगे। मिलते भी जाते और कहते भी जाते-तुम्हीं तो मेरे सब कुछ हो। तुम मुझ पर दया क्यों नहीं करते? 

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मुझ दीन को क्यों त्याग रहे हो? मुझसे ऐसा कौन सा अपराध हो गया है? मुझे मत त्यागो। तुम सबसे विलग होकर मैं जीवित नहीं रह सकता।

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राजा मधुकरशाह उनकी ऐसी दशा देखकर रो पड़े और उनके चरणों में सिर रखकर बोले-मेरे दुराग्रह से आपको बहुत कष्ट हुआ। 

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आपके ह्मदय को मैने बहुत व्यथित किया, फिर भी आपने मुझे कोई कठोर वचन नहीं कहा। मैं अब आपको ले जाने के लिए हठ नहीं करूँगा। आपकी जिसमें खुशी हो, आप वहीं करें। 

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मेरे अपराध को क्षमा कर दें और अपना सेवक जानकर मुझे उपदेश करें।

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श्री व्यासदास जी ने कहा- आप तो विचारवान हैं और पहले ही भगवद्भक्त और साधु-सेवी हैं। 

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बस इसी प्रकार अपना समय भजन-सुमिरण और सन्त सेवा में लगाते रहे, क्योंकि यह दोनों ही चीज़ें कल्याणकारी और संसार सागर से पार करने वाली हैं। 

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जीवन क्षणभंगुर है और इसका कोई भरोसा नहीं कि कब हाथों से चला जाए। अन्त समय सिवाय सन्त-सेवा और भजन-सुमिरण की कमाई के और कोई वस्तु काम नहीं आती। 

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रिश्तेनाते, मान-बड़ाई, राज्य-वैभव सब कुछ यहीं रह जायेगा। इसलिए जितना अधिक से अधिक हो, आप सन्त-सेवा और भजन-सुमिरण में अपना समय लगायें, ओड़छा नरेश वापस लौट गए। 

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जब राजपुरोहितानी को पता चला कि राजा के आग्रह पर भी उसके पति नहीं लौटे, तो अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर वह वृन्दावन श्री व्यासदास जी के पास जा पहुंची, परन्तु उन्होंने उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखा। 

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वह फूट-फूटकर रोने लगी। लोगों ने जब सिफारिश की, तो श्री व्यासदेव जी ने कहा-जो नारी भक्ति-परमार्थ में न लगी हो, उसे अपने पास रखना तो मानो स्वयं ही यम के पाश में अपने आपको फँसाना है।

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यह सुनकर उसने श्री व्यासदास जी के चरणों में सिर रख दिया और विनय की-आप जैसे भी आज्ञा करेंगे, मैं उसी प्रकार रहूँगी, परन्तु मुझे अपने चरणों से विलग मत कीजिए। 

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श्री व्यासदास जी ने कहा- एक शर्त पर तुम यहाँ रह सकती हो कि मेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना होगा और आश्रम में रहकर गुरु-आज्ञानुसार सेवा करनी होगी।

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उसके स्वीकार कर लेने पर श्री व्यासदास जी ने उसे गुरुदेव से दीक्षा दिलाई। उसका नाम "वैष्णवदासी' रखा गया। 

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किन्तु पुत्रों को उन्होंने दीक्षा नहीं दिलवाई। जब उनके पुत्र बड़े हो गए, तो एक दिन एक पुत्र ने सन्त हरिदास जी की बड़ी प्रशंसा की। 

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यह सुनकर श्री व्यासदास जी बहुत प्रसन्न हुए और उसे सन्त हरिदास जी से दीक्षा लेने के लिए कहा। 

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उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर उसने सन्त हरिदास जी से दीक्षा ली और वह "चतुर युगल किशोरदास' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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श्री व्यासदास जी भगवान के भक्त तो थे ही, सन्तों और भक्तों के भी भक्त थे। सन्तों-भक्तों को देखकर उनका ह्मदय गद्गद हो उठता था। नम्रता, दीनता, सहनशीलता तथा प्रेम के तो वे मानो साक्षात् स्वरुप थे। 

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कहते हैं- एक बार इनकी महिमा सुनकर एक व्यक्ति ने इनकी परीक्षा लेने का विचार किया। 

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वह भक्त का वेष बनाकर उनके पास पहुंचा और जाते ही बोला-मुझे बड़े ज़ोरों की भूख लगी है, शीघ्र भोजन कराओ।

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श्री व्यासदास जी ने उनके लिये आसन बिछाते हुए कहा- आप विराजिये, भगवान को भोग लगने ही वाला है। 

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उस व्यक्ति ने कहा- मुझे बहुत भूख लगी है। पहले मुझे भोजन करा दो, भगवान को भोग बाद में लगाते रहना। 

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श्री व्यासदास जी बोले- यह कैसे सम्भव है? आप तो भगवान के भक्त हैं। क्या भगवान को भोग लगाये बिना भोजन करेंगे? 

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बस! कुछ ही पल की देर है। आप विराजिये, अभी भोजन आ जाता है।

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यह सुनते ही वह व्यक्ति गर्म हो गया और उनके प्रति अपशब्दों का प्रयोग करने लगा, 

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परन्तु वे कुछ नहीं बोले, चुपचाप सुनते रहे। अन्य लोगों से न रहा गया। 

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वे जब उस व्यक्ति को  रोकने लगे, तो श्री व्यासदास जी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। 

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थोड़ी ही देर में भगवान को भोग लग गया। श्री व्यासदास जी ने भगवत्प्रसाद का थाल लाकर उस व्यक्ति के सामने रख दिया और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्रतापूर्वक कहा-आप पहले प्रसाद पा लें, शेष जो कुछ कहना हो, बाद में कह लीजियेगा।

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वह व्यक्ति भोजन करने बैठा, तो व्यासदास जी पंखे से हवा करने लगे। 

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जब उस व्यक्ति ने भोजन कर लिया तो खाली थाली उसने व्यासदास जी के सिर पर दे मारी। किन्तु वे फिर भी चुप रहे। 

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यह देखकर उस व्यक्ति ने उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और उनका सेवक बन गया।

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श्री व्यासदास जी के विषय में अनेकों चमत्कारिक बातें भी पढ़ने-सुनने को मिलती हैं, उनमें से यहाँ एक घटना का वर्णन किया जाता है। 

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एक बार ओड़छा-नरेश ने भगवान के लिए एक ज़रकशी पाग भेजी। 

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श्री व्यासदास जी वह पाग भगवान को बाँधने लगे, परन्तु अनेक बार बाँधने पर भी जब उनसे ठीक प्रकार से पाग नहीं बँधी, 

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तो वे पाग वहीं रखकर यह कहते हुए बाहर चले गए कि यदि मेरी बाँधी हुई पाग पसन्द नहीं आती, तो फिर स्वयं बाँध लें। 

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कहते हैं कि थोड़ी देर बाद जब ये अन्दर गए तो देखा कि भगवान के शीश पर बड़े सुन्दर ढंग से पाग बँधी हुई है।

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श्री व्यासदास जी ने ब्राजभाषा में बहुत सारे पद लिखे हैं। निम्नलिखित पद उन्हीं का लिखा है।

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जो सुख होत भक्त घर आये।

सो सुख होत नहीं बहु सम्पति, 

बाँझहिं बेटा जाये।। टेक।।

जो सुख भक्तनि कौ चरणोदक, 

पीवत गात लगाये।

सो सुख कबहुँ सपनेहुँ नहिं पैयत, 

कोटिक तीरथ न्हाये।।1।।

जो सुख होत भक्त वचननि सुनि, 

नैनन नीर बहाये।

सो सुख कबहुँ न पैयत पितु घर, 

पूत कौ पूत खिलाये।।2।।

जो सुख होत मिलत साधुनि सौं, 

छिन छिन रंग बढ़ाये।

सो सुख होत न "ब्यास' रंक को, 

लंक सुमेरहिं पाये।।3।।