नाम : निर्मला सुंदरी

जनम दि : 30 अप्रैल 1896
ठिकाण : खोरा, ब्राम्हणबारिया, बंगाल
पती : रमनी मोहन चक्रवर्ती 
व्यवसाय :  संत
मर गए : 27 अगस्ता 1982  86 वर्षे की आयु 

प्रारंभिक जिवनी :


        आनंदमयी का जन्म निर्मला सुंदरी देवी के रुप में 30 अप्रैल 1896 को वर्तमान समय मे बाग्लांदेश के तिलोरा जिेले अब ब्राम्हणबेरिया जिला के गॉव मे हुआ था | उनके माता पिता एक रुढिवादी बैष्णव ब्राम्हण बिपिन बिहारी भट्रटाचार्य और मोक्षदा सुंदरी देवी थे |  उनके पिता जो मूल रुप से त्रिपुरा के विघाकूट के निवासी  थे |  एक वैष्णाव गायक थे, हालांकि परिवार गरीबी मे रहता था |  निर्मला ने लगभग 2 से 4 महिने तक सुल्तानपूर और खीरो के गॉव स्कूलों मे पढाई की |   हालॉकी उनके शिक्षक उसकी क्षमता से प्रसन्ना थे, लेकिन उसकी मॉ ने लगातार उदासीन और खूश रहने ने कारण अपनी बेटी के मानसिक विकास की चिंता की |   जब उसकी माँ एक बार गंभीर रुप से बीमार हो गई,  तो रिस्ते  दारों ने भी बच्चे के बारे मे पहेली के साथ टिप्पणी की कि वह स्पष्ट रुप से अप्रभावित है |


        1908  मे बारह साल की उम्र मे,  10  महिने, उस समय ग्रामीण रीती रिवाजेों को ध्यान मे रखते हुए |  उनकी शादी विक्रमपूर अब मुंशीगंज जिला के रमणी मोहन चक्रवर्ती से हुई थी ,  जिसे बाद मे भोलानाथ नाम दिया गया |  वह अपने साले के घर पर शादी के पाँच साल बाद, काफी समय से एक हटकर ध्यान की अवस्था मे गृहकार्य मे भाग ले रही थी |  यह अष्टग्राम मे था कि एक कटटर पडोसी हरकुमार, जिसे व्यापक से पागल माना जाता था,  ने अपनी अध्यात्मिक प्रतिभा को पहचान और उसकी घोषणा  की उसे  मा के रुप मे संबोधित करने की  आदत विकसित की, और श्रध्दा मे सुबह और शाम से पहले उसे प्रमाण किया |


        जब निर्मला लगभग सत्रह साल की थी, तो वह अपने पति के साथ रहने चली गई,  जो अष्ट्ग्राम शहर मे काम कर रहा था |  1918  मे, वे बाजितपूर चले गएण् जहाँ वह 1924 तक रही |  यह एक विवाहित विवाह था जब भी रमणी के प्रति वासना के विचार होते,  निर्मला का शरी मृत्यू के गुणों कों ग्रहण कर लेता |


        अगस्त 1922 की पूर्णिमा की रात,  आधी रात को , छब्बीस वर्षीय निर्मला ने अपनी अध्यात्मिक दीक्षा ग्रहण की |  उन्होंने बताया कि समारोह और उसके संस्कार उनके लिए अनायास ही प्रकट हो रहे थे, जब उन्हें बुलाया गया था |  हालांकि इस मामले पर अशिक्षीत होने पर जटिल संस्कार पारंपारिक प्राचीन हिंदू धर्म के लोगों से मेल खाते है ,  जिनमे फूलो का प्रसाद, रहस्यामय चित्र यन्त्र और अग्नि संस्कार यज्ञ शामिल है |  उसके बाद मे कहा,  गुरु के रुप मे मैने मंत्र का खुलासा शिष्धा के रुप मे उन्होंने इसे स्वीकार किया और इसे सुनाना शुरु किया |

कार्य :


        निर्मला 1924 मे अपने पति के साथ शाहबाग चली गई, जहाँ उन्हे ढाका के नवाब के बागानों के कार्यवाहक के रुप मे नियुक्त किया गया था |  इस अवधि के दौरान निर्मला सार्वजनिक किर्तन मे परमानंद गई |  निर्मला को आनंदमयी मॉ कहा जाता है,  जिसका अर्थ है, खूशी की अनुमति मॉ, या आनंद की अनुमति मॉ|  वह मुख्य रुप से 1929 मे रमना काली मंदिर के परिसर के भीतर रमना मे आनंदमयी मा के लिए बनाए गए पहले आश्रम के लिए जिम्मेदार थे |

मृत्यू :


        27 अगस्ता 1982 को देहरादून मे मा का निधन हो गया और बाद मे 29 अगस्ता 1982 को उत्त्र भारत के हरिव्दार मे स्थित उनके कनखल आश्रम के प्रांगण मे एक समाधि मंदिर का निर्माण् किया गया | आनंदीमयी मॉ ने कभी भी तैयार नही किए, जो उन्होंने कहा था |  उसे लिखा या संशोधित किया लोगों को उनकी संवैधानिक गति के कारण अक्सर अनौपचारिक बातचीत करने मे कठिनाई होती थी |  उपलब्धा हाने से पहले अपने भाषण को प्रसारित करने का किया |

पूस्तके :


1) अलेक्जेंडर लिपस्की, ओरिएंट बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स 1983 व्दारा श्री आनंदमयी मॉ का जीवन और शिक्षा
2) 1999 मे ऑक्साफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, लिसा लासेल हॉलस्ट्रॉम व्दारा मदर ऑफ ब्लिस
3) एक योगी की आत्मकथा – योगानंद परमहंस
4) आनंदमयी मॉ का अनुकंपा स्पर्श – चौधरी नारायण
5) श्री मा आनंदमयी के साथ सहयोग मे दत्ता अमूल्य कुमार
6) रे जे मदर असा रिवील्डा टू मी, भाईजी
7) श्री मा आनंदमयी – गिरी गुरुप्रिया आनंद
8) श्री मा आनंदमयी के साथ मेरे दिन मुकर्जी बिथिका 2002.