फिरोजपुर जिले के अंतर्गत मुक्तसर से लगभग छह मील पर मत्ते दी सराय नाम के एक गाँव में फेरु नाम का एक व्यापारी रहता था । बाद में वह हरिवो नामक एक दूसरे गाँव में जाकर बस गया । यहाँ उसका व्यापार बहुत अच्छा चला । फेरू ने यहॉ दया कौर के साथ अपना दूसरा विवाह कर लिया । इन्ही दया कौर के गर्भ से गुरू अंगद का जन्म बिक्रम संवत १५६१, वैशाख शुक्ल एकादशी में हुआ इनका नाम लहिंणा रखा गया । 
लहिंणा ने मत्ते दी सराय की एक स्त्री के साथ अपना व्याह किया, जिसका नाम खीवी था । कालान्तर में खीवी से एक पुत्री और दो पुत्र हुए । लडकी का नाम था अमरो और लडकों कै नाम थे दासू और दातू। 

ये लोग हरिफे गाँव से उठकर फिर मत्ते दी सराय में रहने लगे । मगर मुगलो और बलूचियों के हमले से जब मत्ते दी सराय तबाह हो गई, तब ये लोग खडूर नामक गाँव में चले आये । यह गॉव अमृतसर जिले की तरनतारन तहसील में है । 

लहणा पहले दुर्गा के उपासक थे । इस घटना से यह दुर्गा की उपासना 'छोडकर बाबा नानक के अनन्य भक्त हो गये। खडूर में जोधा नाम का एक सिक्ख रहता था । गुरु नानक का यह परम भक्त था । रात के पिछले पहर वह नित्य जपुजी का तथा आसा दीवार का पाठ किया करता
था । एक सुंदर रात्रि को लहिणा ने जोधा के मुख से ये मदुर कडियों बड़े ध्यान से सुनीं और वह उधर आकृष्ट हो गये।


“जितु सेवई सुख पाईऐ सो साहिब सदा समालई।
जित कीता पाड़ऐ अपना सा घाल बुरी कि गालियऐ।
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        अर्थात्-सदा याद रख तू उस मालिक को, जिसकी सेवा करने से ही तुझे सच्चा सुख मिलेगा । ऐसे बुरे कर्म तूने किये ही क्यों, जिनके कारण तुझे ये सारे दुख भोगने पडे? तू बुरा काम बिल्कुल न कर, अपनी ओर तू अच्छी तरह नज़र डाल; ऐसा पांसा फेक, जिससे कि तू मालिक के साथ बाजी न हारे, बल्कि तुझे कुछ लाम हो। 
      सवेरा होते ही लहिणा ने जोधा से पूछा-‘वह किसका रचा भजन था, जो तुम बडे प्रेम से रात को गा रहे थे?" जोधा ने कहा…"बाबा नानक का रचा है । वे परमात्मा के ऊँचे भक्त है । रावी के किनारे के करतारपुर में बिराजते है ।
        ' सुनते ही लहिणा का गुरु चविरहातुर मन व्याकुल हो उठा बाबा नानक के दर्शन को । एक दिन वह संयोग भी आ गया । अपने कुटुबियों और कुछ मित्रों को लेकर वे ज्वालामुखी की यात्रा करने जा रहे थे । रास्ते में करत्तारपुर पड़त्ता था । वहाँ ठहर गये बाबा नानक का दर्शन करने के लिए । दर्शन किया और बाबा के उपदेश भी सुने । अंतर का चोला पलट गया । दृष्टि खुल गई । इरादा बदल दिया । आगे नहीं बढे, हालांकि साथ के यात्रियों ने बहुत समझाया । वावा के चरणों को पकड़ लिया, वहीँ जमकर बैठ गये । पर सदूगुरु ने कहा "अमी तू घर लोट जा; बाल बच्चों से मिलकर कुछ दिनों के बाद फिर मेरे पास आ जाना, तब तुझे मैं अंगीकार करूंगा।'
        घर एक वार लोटकर चले तो गये, पर मन को वही छोडकर । घरवालों को समझा बुझाकर फिर करतामुर चले आये । साँझ का समय था । बाबा नानक तब खेत पर थे । गाय भैंसों के लिए घास लाने गये थे । वही पर लहिणा सीधे पहुंचे ओर घास के तीन बड़े बड़े गट्टरों को एकसाथ ही सिर पर लादकर गुरु के घर ले आये । पानी ओर गोली मिट्टी से सारे कपड़े सन गये ये । घास फे इन,गट्ठरों को एक एक करके भी ले जाने के लिए बावा के दोनों पुत्र भी तेयार नहीं हुए थे । गुरु सेवा की यह लहणा की पहली परीक्षा थी । एक साल गुरु नानकदेव के घर की कच्ची दीवार अति वर्षा के कारण गिर पडी धी । गुरु की आज्ञा से उस दीवार को तीन वार गिरा गिराकर इन्होंने अकेले ही उठाया था । और भी कितने ही अवसरों पर गुरु नानक ने लहिणा की कठिन से कठिन परीक्षाएं ली, ओर यह उनमें उत्तीर्ण हुए । आज्ञा पालन में यह हमेशा सब शिष्यों और दोनों पुत्रों से भी आगे रहते थे । 
       "टीक्के दी वार’ में आया हे-"
      जिनी कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ।' 

अर्थात्, लहणा ने गुरु नानक की प्रत्येक आज्ञा का पालन किया, चाहे वह आज्ञा आवश्यक हो, या अनावश्यक।  गुरु नानक ने अच्छी तरह परखकर देख लिया कि लहिणा ही उनका एक ऐसा शिष्य है, जो उनकी गदूदी का अधिकारी हो सक्ता है, और इन्हें ही उन्होंने अपनी जगह बिठलाकर भाई बुटूडा के हाथ से तिलक करा दिया । गुरु की आज्ञा से यह खडूर में जाकर रहने लगे । 
      गुरु नानकदेव की शरीर शूट जाने पर गुरु अंगद को उनके बियोग का दुख इतना अधिक असह्य हुआ कि वे एक बंद क्टोरी के अंदर जाकर बैठ गये और वहाँ एकान्त में गुरु के ध्यान में निरन्तर लीन रहने लगे । गुरु नानक के एक प्रमुख शिष्य भाई बुढा जी ने बडी मुश्किल से खोजते खोजते इनका पता लगाया और उन्हें बंद कोठरी से बाहर निकाला । गुरु अंगद ने भाई बुढा को छाती से लगाकर उस समय यह श्लोक कहा: 
   'जिस  पिआरै" सिउ नेहु तिस आगै मर चल्लिऐ........

    गुरु अंगद का नित्य का कार्यक्रम तब से बराबर यह रहने लगा बड़े सवेरे उठकर ठ'डे पानी से नहाना, कुछ समय तक आत्म चिंतन व जपुजी का पाठ करना, गायकों से आसा दी वार का गान सुनना, और फिर दीन दुखियों और रोगियों, खासकर क्रोढियों को जाकर देखना ओर उनकी सेवा करनी । लोगों को गुरु नानक की शिक्षाओं का उपदेश देना ओर लंगर में सबको, बिना किसी भेद भाव के, प्रेम के साथ भोजन कराना ओर किसी किसी दिन छोटे छोटे बच्चों के खेल देखना।शेरशाह द्वारा परास्त हुमायूँ बंगाल से जब पश्चिम की तरफ़ विवश होकर भागा, तब उसे रास्ते में मालूम दुआ कि गुरु नानकदेव की गदूदी पर गुरु अंगद, जो एक पहुचे हुए फकीर है, उपदेश दे रहे है । उसने खडूर जाकर गुरु साहब के दर्शन किये, और उनसे आशीर्वाद माँगा, जो उसे मिला । कुछ दिन मुसीबतें झेलने के बाद वह विजयी हुआ । 

दूसरे गुरु अंगद ने ही सबसे पहले गुरु नानकदेव के पदों, पोड्रिर्यो और श्लोकों का संग्रह कराकर 'गुरुमुखी' नाम की एक नई लिपि में लिखवाया । इस लिपि का आविष्कार गुरु अंगद ने स्वयं ही किया । इसमें क्वेल ३५ अक्षर हैं । 

परम गुरुभक्त शिष्य अमरू को गुरु गदूदी पर बिठलाकर और पॉच पैसे और एक नारियल उसके आगे भेटस्वरूप रखकर गुरु अंगद ने उसे अपना उत्तराधिकारी बना दिया । अमरू उस दिन से गुरु अमरदास के नाम से प्रख्यात हो गये । गुरु अंगद देव का जीवन सादा था, उनके उपदेश भी बहुत सरल थे । वे सरल भाषा में लोगों को सतनाम का ’सदा स्मरण करने को कहते थे । काम, क्रोध. लोभ तथा अहंकार जैसे अवगुणों से दूर रहने को कहते थे । हर इंसान में भगवान का रूप खोजने का अनुरोध करते थे । घर आने वाले का स्वागत तथा सम्मान करना चाहिए ओर यथा सामष्टर्य उनकी सेवा करनी चाहिए । आय का दसवां भाग गुरु के नाम भेट कर देना चाहिए। प्रत्येक से प्रेम तथा भाईचारे से मिलने को कहते । उन्होने सदुपदेशो को लिपिबद्ध भी किया । 

चैत सुदी ३, संवत् १६०६ को गुरु अंगद कै सिवखों को एक बहुत वड़ा भंडारा दिया और सिक्ख धर्म के सिद्धांतों पर दृढ़ रहने के लिए उन्हें अच्छी तरह समझाया। दूसरे दिन चौथ को बड़े सवेरे स्वान करके जपुजी का पाठ किया, और" वाह गुरु, वाह गुरु' कहते हुए चोला छोड़ दिया जाते जाते गुरु अमरदास को गोइंदवाल में जाकर रहने का आदेश दे गये । इनकी मृत्यु विक्रम संवत् 9६०६ मे चैत्र शुक्ल चतुर्थी को हुई थी ।